नई दिल्ली, 22 सितंबर।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि दो वयस्क नागरिकों को अपनी इच्छा से विवाह करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। न्यायमूर्ति संजीव नरुला की पीठ ने सुनवाई के दौरान रेखांकित किया कि अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनना और उनके साथ शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करना, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा और निजता के अधिकार का एक अभिन्न अंग है। इसके साथ ही, अदालत ने अंतर्जातीय विवाह करने वाले राजस्थान के एक नवविवाहित जोड़े को पुलिस सुरक्षा प्रदान करने के कड़े निर्देश दिए हैं।
अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता जोड़े की पैरवी कर रहे वकीलों ने अदालत को जानकारी दी कि महिला की आयु 25 वर्ष और पुरुष की आयु 23 वर्ष है, तथा दोनों अलग-अलग जातियों से ताल्लुक रखते हैं। दोनों ने अपनी स्वैच्छा से बीते 11 सितंबर को आर्य समाज मंदिर खिड़की ट्रस्ट में वैवाहिक जीवन में प्रवेश किया था, जिसके बाद 14 सितंबर को उनके इस विवाह का औपचारिक पंजीकरण भी करा लिया गया।
युवती का मुख्य आरोप था कि उसके परिजन इस अंतर्जातीय विवाह के बिल्कुल पक्ष में नहीं हैं और लगातार धमकियां दे रहे हैं। जोड़े के कानूनी सलाहकारों ने 12 सितंबर को ही राजस्थान के झोटवाड़ा थाने के एसएचओ से फोन पर संपर्क कर विवाह की आधिकारिक जानकारी दी थी और सभी आवश्यक दस्तावेज भी उपलब्ध कराए थे। इसके बावजूद, स्थानीय पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137(2) के तहत एफआईआर दर्ज कर ली थी।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उच्च न्यायालय ने मालवीय नगर थाने के एसएचओ को सख्त आदेश दिया है कि वह इस जोड़े को सुरक्षा से जुड़ी किसी भी प्रकार की आशंका की स्थिति में पूरी सहायता प्रदान करें। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को उनके स्थानीय पुलिस थाने और संबंधित बीट कांस्टेबल का पूरा विवरण उपलब्ध कराया जाए, तथा वकीलों के माध्यम से जोड़े के वर्तमान निवास स्थान की सटीक जानकारी भी स्थानीय पुलिस को साझा की जाए।















