नई दिल्ली, 23 सितंबर।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ न्यायमूर्ति ए. अमानुल्लाह एवं न्यायमूर्ति मनमोहन ने ऑयल एंड नेचुरल गैस कमीशन बनाम सूर्यकांत डी. लाड एवं अन्य की याचिका में स्पष्ट किया है कि पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के तहत नियंत्रक प्राधिकारी का काम सिर्फ ग्रेच्युटी की रकम तय करना है, यह तय करना नहीं कि असली नियोक्ता कौन है।
याचिका के तथ्यों के अनुसार, ओएनजीसी में ठेकेदार के माध्यम से श्रमिक नियोजित थे, जिन्हें पांच वर्ष की सेवा पूर्ण होने के बाद ठेकेदार ने हटा दिया। उनके द्वारा मुख्य नियोक्ता ओएनजीसी से ग्रेच्युटी की मांग की गई। ग्रेच्युटी न्यायालय ने दावा अमान्य किया, परंतु उच्च न्यायालय ने मुख्य नियोक्ता याचिकाकर्ता को ग्रेच्युटी भुगतान के लिए जिम्मेदार माना।
ओएनजीसी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर उच्च न्यायालय के निर्णय को चुनौती दी।
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय में कहा कि ठेका कर्मचारी का नियोक्ता उसका ठेकेदार होता है, जिसकी नियुक्ति-पत्र, वेतन रजिस्टर और भविष्य निधि में रिकॉर्ड उसके पास होता है। यदि इस पर विवाद है कि कर्मचारी वास्तव में ओएनजीसी/विभाग का है या ठेकेदार का, तो यह विवादित प्रश्न है। इसका फैसला नियंत्रक प्राधिकारी नहीं कर सकती। इसके लिए सही फोरम (श्रम न्यायालय/औद्योगिक न्यायाधिकरण) में जाना होगा।
मुख्य नियोक्ता स्वतः ग्रेच्युटी देने के लिए बाध्य नहीं है।
पीठ ने कहा कि मुख्य नियोक्ता की जिम्मेदारी केवल वेतन भुगतान की है, जो संविदा श्रमिक अधिनियम, 1970 के प्रावधान 21(4) से बंधनकारी है। ग्रेच्युटी भुगतान का दायित्व मुख्य नियोक्ता का नहीं, ठेकेदार नियोक्ता का है।
पीठ ने यह भी कहा कि ठेकेदार द्वारा नियोजित कर्मचारियों का मुख्य नियोक्ता से सेवक-स्वामी का कोई सीधा संबंध नहीं होता है। इसलिए भी ग्रेच्युटी भुगतान का दायित्व ठेकेदार नियोक्ता का ही होता है।
पीठ ने यह भी कहा कि जिन कर्मचारियों को इस प्रकरण के विवादित समय में ओएनजीसी पहले ही ग्रेच्युटी दे चुका है, उनसे वसूली नहीं होगी।















