हरिद्वार, 23 सितंबर।
देशभर में 11वें आयुर्वेद दिवस का पर्व उत्साह के साथ मनाया जा रहा है, जिसकी इस वर्ष की मुख्य थीम “स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद” निर्धारित की गई है। इस अवसर पर आधुनिक जीवनशैली से उत्पन्न होने वाली स्वास्थ्य चुनौतियों, बीमारियों और उनके निवारण में आयुर्वेद की प्रासंगिकता को लेकर आयुर्वेद विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण विचार साझा किए हैं।
उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के ऋषिकुल परिसर के परामर्श चिकित्सक डॉ. अवनीश कुमार उपाध्याय और जीवनशैली एवं योग विशेषज्ञ डॉ. रुचिता त्रिपाठी उपाध्याय के साथ हुई विशेष चर्चा में यह बात सामने आई कि आज के दौर में खानपान की गलत आदतें, शारीरिक श्रम की कमी, अत्यधिक मानसिक तनाव और देर तक बैठकर काम करने की संस्कृति लोगों को मधुमेह, उच्च रक्तचाप व मोटापे जैसी गंभीर बीमारियों की तरफ धकेल रही है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि आयुर्वेद का मूल उद्देश्य केवल रोग के प्रकट होने के बाद उसका उपचार करना नहीं है, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और व्यक्ति को समग्र रूप से देखना है।
चर्चा के दौरान इस बात पर भी जोर दिया गया कि पोषण का मतलब किसी एक चमत्कारी खाद्य पदार्थ का सेवन करना नहीं, बल्कि संतुलित, विविधतापूर्ण और उम्र व दिनचर्या के अनुसार सही समय पर भोजन करना है। इसके साथ ही योग, प्राणायाम, ध्यान और पंचकर्म जैसी प्राचीन पद्धतियों को वैज्ञानिक अनुसंधान और आधुनिक चिकित्सा के साथ समन्वयित करके अपनाने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य की असली शुरुआत अस्पतालों से नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली और खानपान से होती है, जिसके लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पूरी नींद और मानसिक संतुलन जैसी पांच जरूरी प्रतिज्ञाओं को अपने जीवन का हिस्सा बनाना बेहद आवश्यक है।
















