ईरान के साथ युद्ध अब केवल अमेरिका की विदेश नीति का प्रश्न नहीं रह गया है। लंबे समय से जारी संघर्ष ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति, अमेरिकी कांग्रेस की भूमिका और रिपब्लिकन पार्टी की असहजता को सामने ला दिया है। युद्ध शुरू होने के समय इसे जल्दी समाप्त होने वाली कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन समय बीतने के साथ उसका आर्थिक और राजनीतिक बोझ बढ़ा है।
कुछ रिपब्लिकन उम्मीदवारों ने युद्ध समाप्त करने की मांग शुरू की है। मिशिगन के माइक रोजर्स और आयोवा की एशली हिंसन जैसे नेताओं का रुख बताता है कि युद्ध अब पार्टी के लिए सहज राजनीतिक मुद्दा नहीं रहा। वे संघर्ष खत्म करने की बात कर रहे हैं, लेकिन ट्रंप के उस फैसले की सीधी आलोचना से बच रहे हैं, जिसके बाद सैन्य अभियान शुरू हुआ। यह स्थिति अमेरिकी राजनीति की एक बड़ी समस्या को दिखाती है। किसी नीति के परिणामों से दूरी बनाना आसान है, लेकिन उसकी शुरुआत पर सवाल उठाना अपने ही दल के नेतृत्व को चुनौती देना माना जा सकता है।
जनमत सर्वेक्षण भी बदलते माहौल की ओर संकेत कर रहे हैं। सितंबर में सीएनएन के सर्वेक्षण में केवल 26 प्रतिशत अमेरिकी ट्रंप के ईरान युद्ध से निपटने के तरीके से संतुष्ट थे, जबकि 73 प्रतिशत असंतुष्ट थे। 64 प्रतिशत ने कहा कि अमेरिका युद्ध नहीं जीत रहा और 70 प्रतिशत ने माना कि संघर्ष ने अमेरिका तथा उसके हितों को नुकसान पहुंचाया है। रिपब्लिकन मतदाताओं में भी समर्थन मार्च के 73 प्रतिशत से घटकर 60 प्रतिशत रह गया। इन आंकड़ों को चुनावी परिणाम का पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता, लेकिन वे युद्ध को लेकर सार्वजनिक राय में बदलाव जरूर दिखाते हैं।
ईंधन और दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर युद्ध का असर सीधे घरेलू अर्थव्यवस्था तक पहुंचता है। यही कारण है कि विदेश नीति धीरे-धीरे रोजमर्रा की राजनीति का विषय बन जाती है। रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए चुनौती है कि वे मतदाताओं की चिंता व्यक्त करें, लेकिन राष्ट्रपति से खुला टकराव भी न मोल लें।
इस विवाद का सबसे गंभीर पहलू अमेरिकी कांग्रेस की भूमिका है। अमेरिकी संविधान युद्ध की घोषणा का अधिकार कांग्रेस को देता है, जबकि राष्ट्रपति सशस्त्र सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर होते हैं। 1973 का वॉर पावर्स एक्ट भी राष्ट्रपति की सैन्य कार्रवाई पर कांग्रेस की भूमिका सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाया गया था। फिर भी युद्ध शुरू होने के बाद राष्ट्रपति को रोकना कठिन रहा है। सितंबर में सीनेट ने ईरान युद्ध को समाप्त करने या आगे की सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस की अनुमति आवश्यक बनाने वाले प्रस्ताव को 50 के मुकाबले 49 मतों से खारिज कर दिया। यह इस तरह के प्रस्ताव पर चौदहवां मतदान था।
इससे बुनियादी लोकतांत्रिक सवाल उठता है। यदि कांग्रेस के पास युद्ध पर संवैधानिक अधिकार है, तो सैन्य कार्रवाई शुरू होने के बाद उसकी वास्तविक शक्ति इतनी सीमित क्यों दिखाई देती है? गैर-बाध्यकारी प्रस्ताव राष्ट्रपति को कार्रवाई रोकने के लिए बाध्य नहीं करते।
ट्रंप के बयान भी युद्ध के अंतिम लक्ष्य को लेकर स्पष्टता नहीं देते। उन्होंने ईरान के साथ समझौते की संभावना की बात की है, लेकिन साथ ही कठोर सैन्य कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। शुरुआती दौर में तत्काल परिणाम की भाषा इस्तेमाल हुई थी, जबकि बाद में आर्थिक दबाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने जैसे लक्ष्य अधिक प्रमुख दिखाई दिए। इससे सवाल उठता है कि युद्ध का अंतिम राजनीतिक उद्देश्य क्या है और उसे समाप्त करने का रास्ता क्या होगा।
किसी भी सैन्य अभियान के लिए स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य, कूटनीतिक विकल्प और युद्ध समाप्त करने की योजना जरूरी होती है। यदि उद्देश्य बदलता रहे, तो संघर्ष लंबा खिंच सकता है और उसकी मानवीय तथा आर्थिक लागत बढ़ सकती है।
ईरान युद्ध ने अमेरिकी लोकतंत्र के उस पुराने प्रश्न को फिर सामने ला दिया है कि युद्ध के मामलों में राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच संतुलन कितना होना चाहिए। यह मुद्दा भी किसी एक दल से बड़ा है। यदि युद्ध जारी रखना है तो उसके लक्ष्य और लागत पर स्पष्टता होनी चाहिए। यदि उसे समाप्त करना है तो व्यावहारिक कूटनीतिक रास्ता भी सामने रखना होगा।
युद्ध केवल मोर्चे पर नहीं लड़े जाते - उनकी कीमत अर्थव्यवस्था, संस्थाओं और जनता के भरोसे को भी चुकानी पड़ती है। ईरान संघर्ष ने अमेरिका के सामने यही सवाल रखा है कि सैन्य शक्ति के इस्तेमाल के साथ लोकतांत्रिक जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जाए। इसका उत्तर केवल व्हाइट हाउस नहीं, बल्कि कांग्रेस और अमेरिकी जनता की भूमिका भी तय करेगी।














