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संपादकीय
28 Sep, 2026

ईवी का सपना और मध्यमवर्ग की जेब

बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच मध्यम वर्ग के लिए इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने का फैसला आर्थिक रूप से कितना व्यावहारिक है और इसकी क्या चुनौतियां हैं।

नई दिल्ली, 28 सितंबर।

पेट्रोल की कीमत जब भी बढ़ती है, मध्यमवर्गीय परिवार का घरेलू बजट थोड़ा और सिकुड़ जाता है। रोज दफ्तर जाने वाले व्यक्ति से लेकर बच्चों को स्कूल छोड़ने वाले माता-पिता तक, निजी वाहन अब सुविधा भर नहीं, रोजमर्रा की जरूरत बन चुका है। ऐसे में इलेक्ट्रिक वाहन यानी ईवी एक आकर्षक विकल्प के रूप में सामने आए हैं। कम ईंधन खर्च, प्रदूषण में कमी और पेट्रोल पंपों पर निर्भरता से मुक्ति जैसे तर्क इन्हें भविष्य की सवारी बताते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ईवी वास्तव में उस मध्यमवर्ग के लिए भी आर्थिक रूप से सहज विकल्प बन चुकी है, जिसके लिए हर बड़ी खरीदारी से पहले कीमत, कर्ज की किस्त और रखरखाव का हिसाब लगाना जरूरी होता है?

ईवी की सबसे बड़ी ताकत उसका दैनिक संचालन खर्च है। पेट्रोल कार में हर किलोमीटर के साथ ईंधन का खर्च जुड़ता है, जबकि घर या अपेक्षाकृत सस्ती चार्जिंग सुविधा उपलब्ध होने पर इलेक्ट्रिक कार चलाने की लागत काफी कम हो सकती है। यही कारण है कि जिन परिवारों का दैनिक आवागमन अधिक है, उनके लिए ईवी का आर्थिक गणित समय के साथ बेहतर दिखाई देता है। लेकिन खरीद के समय तस्वीर कुछ अलग होती है। इलेक्ट्रिक कार की शुरुआती कीमत अभी भी कई मध्यमवर्गीय खरीदारों के लिए बड़ा निर्णय है। यानी जो बचत रोज दिखाई देती है, उसकी भरपाई खरीद के समय अतिरिक्त रकम खर्च करके करनी पड़ती है।

यहीं से ईवी का असली आर्थिक सवाल शुरू होता है। किसी वाहन की कीमत केवल शोरूम में लिखी रकम नहीं होती। उसके साथ बीमा, वित्तीय लागत, सर्विस, टायर, बैटरी की स्थिति, पुनर्विक्रय मूल्य और चार्जिंग व्यवस्था भी जुड़ी होती है। पेट्रोल कार में खरीदार को ईंधन की चिंता रहती है, लेकिन ईवी खरीदार के सामने बैटरी और चार्जिंग से जुड़े सवाल अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। बैटरी वाहन की सबसे महंगी इकाइयों में से एक है। उसकी उम्र, क्षमता में कमी और भविष्य में बदलने की संभावित लागत खरीददार के दीर्घकालिक बजट को प्रभावित कर सकती है।

हालांकि यह भी समझना जरूरी है कि हर ईवी मालिक को बैटरी बदलवाने की जरूरत कुछ वर्षों में ही पड़ जाएगी, ऐसा मान लेना सही नहीं होगा। वास्तविक जीवन में बैटरी का प्रदर्शन वाहन, उपयोग, तापमान, चार्जिंग व्यवहार और निर्माता की तकनीक पर निर्भर करता है। इसलिए केवल संभावित बैटरी लागत के आधार पर ईवी को महंगा या सस्ता घोषित करना उतना ही अधूरा है, जितना केवल पेट्रोल बचत के आधार पर उसे आर्थिक रूप से लाभकारी मान लेना।

ईवी की दूसरी बड़ी चुनौती चार्जिंग व्यवस्था है। घर में पार्किंग और सुरक्षित बिजली कनेक्शन वाले व्यक्ति के लिए रात में वाहन चार्ज करना आसान हो सकता है। लेकिन किराए के मकान, अपार्टमेंट या ऐसी कॉलोनी जहां निजी पार्किंग उपलब्ध नहीं है, वहां स्थिति बदल जाती है। लंबी यात्रा करने वाले व्यक्ति के लिए रास्ते में तेज चार्जिंग स्टेशन की उपलब्धता भी निर्णायक हो जाती है। सरकार की 2024 की चार्जिंग अवसंरचना संबंधी गाइडलाइन में शहरी क्षेत्रों में एक किलोमीटर गुणा एक किलोमीटर के ग्रिड में चार्जिंग स्टेशन तथा राजमार्गों पर लगभग हर 20 किलोमीटर पर चार्जिंग सुविधा की दिशा बताई गई है। भारी और लंबी दूरी वाले वाहनों के लिए 100 किलोमीटर के अंतर पर तेज चार्जिंग की व्यवस्था का भी सुझाव है।

इसका अर्थ है कि नीति स्तर पर दिशा स्पष्ट है, लेकिन उपभोक्ता के लिए अंतिम अनुभव स्थानीय अवसंरचना पर निर्भर करता है। किसी महानगर में चार्जिंग सुविधा आसानी से मिल सकती है, जबकि छोटे शहर या कस्बे में वही सुविधा सीमित हो सकती है। भारत में दिसंबर 2024 तक 25,202 सार्वजनिक ईवी चार्जिंग स्टेशन दर्ज किए गए थे। सरकार ने पीएम ई ड्राइव योजना के तहत सार्वजनिक चार्जिंग अवसंरचना के लिए 2,000 करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया है।

ईवी की चर्चा केवल कार खरीदने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसका संबंध पूरे परिवहन तंत्र से है। दोपहिया और तिपहिया क्षेत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार अपेक्षाकृत तेज है। पीएम ई ड्राइव योजना के आंकड़े भी बताते हैं कि इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। योजना को मार्च 2028 तक कुछ श्रेणियों के लिए बढ़ाया गया है।

लेकिन मध्यमवर्ग के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल अब भी वही है: क्या ईवी खरीदना सस्ता है या उसे चलाना सस्ता है? दोनों बातें एक नहीं हैं। यदि कोई व्यक्ति साल में बहुत कम किलोमीटर चलता है, उसके लिए महंगी ईवी खरीदकर केवल ईंधन बचाना जरूरी नहीं कि सबसे बड़ा आर्थिक लाभ हो। इसके उलट रोज लंबी दूरी तय करने वाले व्यक्ति के लिए ईंधन की लगातार बचत शुरुआती अतिरिक्त कीमत की भरपाई कर सकती है। इसलिए ईवी का आर्थिक मूल्य व्यक्ति की जरूरत, सालाना दूरी, चार्जिंग सुविधा और वाहन रखने की अवधि पर निर्भर करता है।

ईवी बाजार को आगे बढ़ाने के लिए केवल सब्सिडी देना पर्याप्त नहीं होगा। खरीदार को भरोसा चाहिए कि पांच या सात साल बाद वाहन की बैटरी, सर्विस और पुनर्विक्रय बाजार की स्थिति क्या होगी। कंपनियों को बैटरी की वारंटी, वास्तविक उपयोग अवधि, मरम्मत लागत और पुनर्विक्रय मूल्य से जुड़ी जानकारी अधिक पारदर्शी तरीके से देनी होगी। उपभोक्ता को केवल आकर्षक विज्ञापन नहीं, पूरे जीवनकाल की लागत समझने का अधिकार है।

असल परिवर्तन तब होगा जब इलेक्ट्रिक वाहन किसी सरकारी प्रोत्साहन या फैशन के कारण नहीं, बल्कि अपने आर्थिक और व्यावहारिक फायदे के कारण खरीदा जाएगा। इसके लिए कीमत कम होना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है भरोसेमंद चार्जिंग नेटवर्क, बेहतर बैटरी तकनीक, उचित सर्विस लागत और मजबूत पुनर्विक्रय बाजार।

भारत में ईवी का भविष्य केवल तकनीक की सफलता से तय नहीं होगा। उसकी असली परीक्षा मध्यमवर्गीय परिवार के बजट में होगी। जिस दिन एक सामान्य परिवार यह गणना करते हुए ईवी खरीदेगा कि इससे उसका खर्च सचमुच नियंत्रित होगा, न कि केवल पर्यावरण बचाने का भाव पैदा होगा, उस दिन इलेक्ट्रिक वाहन भारत की सड़कों पर एक विकल्प नहीं, मुख्यधारा का वाहन बनना शुरू कर देंगे।

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