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संपादकीय
29 Sep, 2026

विसर्जन से सृजन तक भोपाल ने दिखाई नई राह

भोपाल में गणपति विसर्जन के बाद सात घाटों से एकत्र 10 टन से अधिक निर्माल्य सामग्री का पुन: उपयोग किया जा रहा है, जिससे खाद, ट्री गार्ड और सैनिटाइजर तैयार किए जाएंगे।

भोपाल, 29 सितंबर।

भोपाल में गणपति विसर्जन का अर्थ अब तक यही समझा जाता था कि यह भक्ति और आस्था का पर्व है, लेकिन इसके बाद घाटों पर कचरे का ढेर दिखाई देता है। फूल, माला, नींबू, लकड़ी और बांस का स्ट्रक्चर पानी में छोड़ दिया जाता था। नगर निगम की गाड़ियां उसे कचरे की तरह उठा ले जाती थीं। इस बार तस्वीर बदली है और यह बदलाव सोच का है।

नगर निगम ने इस बार शहर के सात घाटों से दस टन से अधिक निर्माल्य सामग्री एकत्र की है। इसमें फूल, माला, नींबू, बांस और लकड़ी का ढांचा शामिल है। पहले यह जल प्रदूषण का कारण बनता था, अब इसी से नया बन रहा है। फूलों से खाद, पूजन सामग्री से सैनिटाइजर और बांस से ट्री गार्ड बनाए जाएंगे। कलियासोत मैदान में ट्री गार्ड बनाने का काम शुरू हो गया है।

यह छोटा सा कदम दिखने में साधारण लगता है, लेकिन इसका संदेश बड़ा है कि हमारे त्योहार पर्यावरण के दुश्मन नहीं हैं। अगर सोच बदली जाए तो विसर्जन भी सृजन बन सकता है।

हम अक्सर थ्री आर यानी रिड्यूस, रीयूज, रीसाइकल की बात करते हैं, लेकिन उसे आस्था से जोड़कर नहीं देखते। भोपाल नगर निगम ने इस बार यही किया है। भक्तों ने जो सामग्री श्रद्धा से चढ़ाई थी, उसे कचरा मानकर फेंकने के बजाय दोबारा उपयोग में लाया जा रहा है। फूलों से खाद बनेगी तो वही खाद नगर निगम के पार्कों में जाएगी। जो फूल बप्पा को चढ़े थे, वही फूल अब शहर के पार्कों में भी खिलेंगे।

बांस और लकड़ी के स्ट्रक्चर का उपयोग ट्री गार्ड बनाने में होगा। जिस लकड़ी ने गणपति की मूर्ति को सहारा दिया था, वही लकड़ी अब एक पौधे को सहारा देगी, जो बड़ा होकर पेड़ बनेगा। यह आस्था का पर्यावरण से सुंदर संगम है।

इस बार विसर्जन के तुरंत बाद घाटों से स्ट्रक्चर निकाल लिया गया, ताकि पानी प्रदूषित न हो। सातों घाटों पर निगम का अमला तैनात रहा। चार वाहन निर्माल्य एकत्र करने के लिए लगाए गए थे। पहले विसर्जन के बाद घाट गंदे छोड़ दिए जाते थे और फिर तालाबों के प्रदूषण की बात होती थी। इस बार निगम ने पहले से योजना बनाई।

अब जरूरत है कि इस पहल को सिर्फ गणेशोत्सव तक सीमित न रखा जाए। हर त्योहार में निर्माल्य निकलता है। अगर नगर निगम हर त्योहार के बाद सामग्री एकत्र कर उसे रीसाइकल करे तो कचरे की समस्या कम हो सकती है। साथ ही लोगों को लगेगा कि उनकी आस्था का सम्मान हो रहा है।

भक्तों को भी इसमें जोड़ा जाए। पंडालों में दो अलग-अलग डस्टबिन रखे जाएं, एक फूल-माला के लिए और दूसरा लकड़ी-बांस के लिए, ताकि संग्रह आसान हो और लोग भागीदार बनें।

भोपाल ने विसर्जन से निकली दस टन लकड़ी, माला और नींबू से ट्री गार्ड और सैनिटाइजर बनाने की राह दिखाई है। यह बताता है कि समाधान हमारे ही कचरे में छिपा है, बस उसे देखने की दृष्टि चाहिए। यह पहल सराहनीय है, लेकिन इसे अभियान बनाना होगा। तभी विसर्जन सच में सृजन कहलाएगा।

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