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संपादकीय
29 Sep, 2026

कांक्रीट के जंगलों से सिकुड़ रहा धरती का स्पंज: बारिश वही, पर पानी सोखने वाली धरती नहीं

देश में 17 साल में पानी सोखने वाली 25 लाख हेक्टेयर जमीन घटने से भूजल पुनर्भरण प्रभावित हुआ है और शहरों में बाढ़ तथा जल संकट का खhttps://naidunialive.com/admin/images/img404.jpgतरा बढ़ रहा है।

नई दिल्ली, 29 सितंबर।

नई दिल्ली से आई एक रिपोर्ट ने पूरे देश को चौंका दिया है। बारिश वही है, लेकिन धरती अब वैसी नहीं रही। सत्रह साल में देश की पानी सोखने वाली जमीन 25 लाख हेक्टेयर कम हो गई है, यानी लगभग 62 लाख एकड़ जमीन पर अब कंक्रीट की चादर बिछ गई है। जहां पहले मिट्टी थी, वहां अब टाइल्स हैं, जहां पहले मैदान था, वहां अब मॉल है और जहां पहले तालाब था, वहां अब कॉलोनी है। कंक्रीट ने पानी का रास्ता रोक दिया है। यह सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि आने वाले समय की बड़ी चुनौती है।

धरती का स्पंज क्या है, यह समझना जरूरी है। आईआईएम अहमदाबाद के 42 शहरों के अध्ययन के अनुसार, शहरों में मिट्टी, खुले मैदान, पेड़-पौधे, तालाब, झील और दूसरे जल क्षेत्र धरती के प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करते हैं। ये बारिश होने पर पानी को रोकते हैं और भूजल स्तर को बढ़ाने में मदद करते हैं। इससे सतह पर पानी का बहाव कम होता है, लेकिन पक्के निर्माण बढ़ने से यह प्राकृतिक स्पंज सिकुड़ रहा है।

डब्ल्यूआरआई की 10 भारतीय शहरों की रिपोर्ट बताती है कि पक्के निर्माण का 44 प्रतिशत हिस्सा ऐसे क्षेत्रों में हुआ है, जहां भूजल रिचार्ज की क्षमता ज्यादा थी। यानी अब वहां सड़कें, इमारतें और कंक्रीट की चादर है। इससे इन शहरों में रोज करीब 87 करोड़ लीटर यानी 870 मिलियन लीटर पानी के जमीन में जाने का रास्ता बंद हो गया। साल भर में यह नुकसान 30 हजार करोड़ लीटर बैठता है। यानी शहरों का विस्तार धरती के उस प्राकृतिक स्पंज को भी छोटा कर रहा है, जो बारिश के पानी को सोखता था।

आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता बताते हैं। जयपुर में पक्की जमीन में 61 प्रतिशत बदलाव हुआ, पानी रिसने वाले क्षेत्र में 46 प्रतिशत कमी आई और भूजल रिचार्ज में रोज 190 लाख लीटर की कमी हुई। बेंगलुरु में पक्की जमीन 76 प्रतिशत बढ़ी, पानी रिसने का क्षेत्र 74 प्रतिशत घटा और रोज 920 लाख लीटर पानी के जमीन में जाने का नुकसान हुआ। चेन्नई में पक्की जमीन 61 प्रतिशत बढ़ी, रिसाव 26 प्रतिशत घटा और रोज 1,090 लाख लीटर का नुकसान हुआ। दिल्ली में पक्की जमीन 61 प्रतिशत बढ़ी, रिसाव 36 प्रतिशत घटा और रोज 1,690 लाख लीटर का नुकसान हुआ। हैदराबाद में पक्की जमीन 60 प्रतिशत बढ़ी, रिसाव 37 प्रतिशत घटा और रोज 750 लाख लीटर का नुकसान हुआ। कोलकाता में पक्की जमीन 19 प्रतिशत बढ़ी, रिसाव 5 प्रतिशत घटा और रोज 1,070 लाख लीटर का नुकसान हुआ। मुंबई में पक्की जमीन 20 प्रतिशत बढ़ी, रिसाव 19 प्रतिशत घटा और रोज 970 लाख लीटर का नुकसान हुआ। सूरत में पक्की जमीन 139 प्रतिशत बढ़ी, रिसाव 1 प्रतिशत घटा और रोज 1,070 लाख लीटर का नुकसान हुआ। ये आंकड़े लाख लीटर में हैं और स्रोत डब्ल्यूआरआई का 2000 से 2015 का अध्ययन है।

केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, बाढ़ से हर साल करीब 3.24 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं। 1,670 लोगों और 97 हजार पशुओं की जान जाती है, वहीं 7,267 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है। अध्ययन में 1991 से 2015 के बीच पक्की जमीन 21 प्रतिशत बढ़ी, जबकि हरित क्षेत्र 5.8 प्रतिशत और खुले क्षेत्र 3.7 प्रतिशत घटे हैं। इस दौरान बाढ़ की घटनाएं 16.5 प्रतिशत बढ़ीं, वहीं बारिश में केवल 0.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। हरे और खुले क्षेत्र कम होने से पानी सोखने की क्षमता भी घटती है।

यह समस्या सिर्फ बड़े महानगरों की नहीं है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे मध्य प्रदेश के शहरों के लिए भी यह चेतावनी है। मध्य प्रदेश में भी पिछले दस साल में कॉलोनियों का जाल बिछा है। तालाबों के किनारे निर्माण हुआ है और खुले मैदान खत्म हुए हैं। अगर यही हाल रहा तो यहां भी हर बारिश में जलभराव और हर गर्मी में भूजल संकट बढ़ेगा।

चीन जैसे कई देशों में इस समस्या को देखते हुए स्पंज शहरों का निर्माण किया जा रहा है, ताकि भूजल स्तर को गिरने से बचाया जा सके। भारत में भी अब इसी सोच की जरूरत है। हर नई कॉलोनी में वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य हो, हर सड़क के किनारे कच्ची जमीन छोड़ी जाए, पार्कों को पक्का न किया जाए, तालाबों को गहरा किया जाए और खुले मैदानों को बचाया जाए।

बारिश बरसी, पर धरती तरसी। यह लाइन कविता नहीं, हकीकत है। पानी ऊपर से आ रहा है, लेकिन नीचे जाने का रास्ता बंद है। हमने अपने ही हाथों से धरती का स्पंज निचोड़ दिया है। अगर अब भी नहीं जागे तो आने वाले समय में हर शहर में बाढ़ भी होगी और प्यास भी, दोनों एक साथ।

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