भोपाल, 29 सितंबर।
प्रदेश में पांच करोड़ 99 लाख से ज्यादा आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट यानी आभा बन चुके हैं और यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था में एक बड़ी क्रांति का संकेत है। डिजिटल पहचान की दिशा में काम तेजी से बढ़ रहा है और सितंबर महीने में ही तीन लाख 67 हजार से ज्यादा मरीजों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड आभा से जोड़े गए हैं।
अब तक पांच करोड़ 99 लाख छह हजार 831 आभा बनाए जा चुके हैं। दो करोड़ 78 लाख तीन हजार 789 स्वास्थ्य रिकॉर्ड अब तक आभा से जोड़े गए हैं। यानी अब डॉक्टर को मरीज की पुरानी फाइल खोजने के लिए अलमारी नहीं खोलनी पड़ेगी, एक क्लिक पर पूरा इतिहास सामने आ जाएगा।
जिलेवार आंकड़ों में इंदौर सबसे आगे है। इंदौर में 26 लाख आभा बनाए गए हैं। भोपाल में 18.9 लाख, सागर में 18.7 लाख, छिंदवाड़ा में 18.6 लाख, धार में 18.1 लाख, रीवा में 17.5 लाख, जबलपुर में 17.2 लाख और सतना में 16.4 लाख आभा बनाए गए हैं। प्रदेश में 20,832 स्वास्थ्य संस्थान सत्यापित किए जा चुके हैं। सितंबर में 400 संस्थान सत्यापित हुए। 1,217 संस्थानों के साथ इंदौर सबसे आगे है। भोपाल में 1,189, ग्वालियर में 1,032 और सीहोर में 1,001 संस्थान सत्यापित किए गए हैं। प्रदेश में 19,511 स्वास्थ्यकर्मी सत्यापित हैं और सितंबर में 222 नए स्वास्थ्यकर्मी जुड़े हैं।
पहले मरीज को हर बार अपनी पुरानी रिपोर्ट, पर्ची और एक्स-रे लेकर अस्पताल जाना पड़ता था। कई बार कागज गुम हो जाते थे और डॉक्टर को अंदाजे से इलाज करना पड़ता था। अब आभा से मरीज की पूरी हिस्ट्री एक जगह रहेगी। डॉक्टर को पता चलेगा कि पहले कौन सी दवा दी गई थी, कौन सी जांच हुई थी और कौन सी बीमारी का इतिहास रहा है। इससे इलाज जल्दी और सटीक हो सकता है। साथ ही फर्जी रिपोर्ट और गलत दवाओं पर भी रोक लग सकती है।
आम आदमी को इसके तीन बड़े फायदे हो सकते हैं। समय और पैसे की बचत होगी, बार-बार एक ही जांच कराने की जरूरत कम होगी और गलत इलाज का खतरा घटेगा, क्योंकि डॉक्टर को मरीज की पूरी जानकारी मिल सकेगी। सरकार को भी सही आंकड़े मिलेंगे कि किस जिले में कौन सी बीमारी ज्यादा है, ताकि उसी हिसाब से दवा और डॉक्टरों की व्यवस्था की जा सके।
इतनी बड़ी व्यवस्था में चुनौतियां भी हैं। गांवों में अभी भी कई लोगों के पास स्मार्टफोन नहीं है। कई लोगों को आभा क्या है, यह भी पता नहीं है। कई अस्पतालों में अभी भी रजिस्टर में नाम लिखा जाता है और कंप्यूटर पर काम धीमा है। इसके साथ ही डेटा की सुरक्षा भी बड़ी जिम्मेदारी है। मरीज का स्वास्थ्य डेटा बहुत निजी होता है और इसे लीक होने से बचाना होगा। इसलिए स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण देने और लोगों में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है।
अब जरूरत है कि आभा को सिर्फ अकाउंट बनाने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे अस्पताल की ओपीडी से जोड़ा जाए। लैब रिपोर्ट सीधे आभा में आए, दवा की पर्ची सीधे आभा में दिखाई दे और मरीज को अपने मोबाइल पर ही सब कुछ मिल जाए। साथ ही आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को भी इस मिशन से जोड़ा जाए, क्योंकि वे ही गांव में स्वास्थ्य व्यवस्था की पहली कड़ी हैं। अगर वे लोगों को समझाएंगी तो गांव का हर व्यक्ति इस डिजिटल पहचान से जुड़ सकेगा।
प्रदेश जिस तेजी से आभा बना रहा है, वह पूरे देश के लिए एक मॉडल बन सकता है। जिलेवार प्रतिस्पर्धा से काम और तेज हुआ है। इंदौर का सबसे आगे होना बताता है कि अगर स्थानीय प्रशासन चाहे तो डिजिटल हेल्थ को जन आंदोलन बनाया जा सकता है। भोपाल को भी अब इंदौर से सीखना होगा कि कैसे हर अस्पताल में आभा काउंटर खोला जाए और हर मरीज को इससे जोड़ा जाए।
भविष्य का अस्पताल ऐसा होगा, जहां मरीज आते ही अपना आभा नंबर बताएगा और डॉक्टर के सामने उसका पूरा रिकॉर्ड आ जाएगा। कागज की फाइल नहीं होगी, लंबी लाइन नहीं होगी और बार-बार वही सवाल नहीं पूछा जाएगा कि पहले कौन सी दवा ली थी। यह व्यवस्था गरीबों के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद होगी, क्योंकि उन्हें अपनी रिपोर्ट संभालने की चिंता नहीं रहेगी।
मरीजों को मिल रही डिजिटल पहचान सिर्फ एक नंबर नहीं है, यह भरोसे की पहचान है कि अब मरीज का इलाज कागज पर नहीं, बल्कि डेटा के आधार पर होगा। भोपाल से लेकर इंदौर तक और सागर से लेकर रीवा तक पांच करोड़ से ज्यादा लोगों ने इस पर भरोसा जताया है। अब बारी व्यवस्था की है कि वह इस भरोसे को टूटने न दे और स्वास्थ्य व्यवस्था को पूरी तरह डिजिटल बनाने की दिशा में आगे बढ़े।














