नई दिल्ली, 29 सितंबर।
देश भर में स्ट्रीट फूड का चलन तेजी से बढ़ रहा है। यह बात अब किसी सर्वे की मोहताज नहीं है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक सड़क किनारे लगने वाले ठेले, रेहड़ी और छोटी दुकानों पर मिलने वाला भोजन आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। कम कीमत, आसानी से उपलब्धता और स्थानीय स्वाद इसकी लोकप्रियता का बड़ा कारण है, लेकिन इसी लोकप्रियता के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या जो हम खा रहे हैं, वह सुरक्षित भी है?
स्ट्रीट फूड बेचने वाले लाखों छोटे कारोबारी अपनी आजीविका इसी व्यवसाय से चलाते हैं। इसलिए नियमन का उद्देश्य उन्हें परेशान करना या उनकी रोजी-रोटी छीनना नहीं होना चाहिए। जरूरत ऐसे व्यावहारिक नियमों की है, जिनसे कारोबार भी चलता रहे और लोगों को सुरक्षित एवं स्वच्छ भोजन भी मिल सके। आज कई जगहों पर एक ही तेल को बार-बार गर्म किया जाता है, बिना ढके मसाले रखे जाते हैं, पानी की गुणवत्ता का कोई पता नहीं होता और बर्तन खुले में धोए जाते हैं। ऐसे में स्वाद तो मिल जाता है, पर सेहत दांव पर लग जाती है।
सरकारों को स्ट्रीट फूड के लिए एक व्यापक और आधुनिक नियामक व्यवस्था पर विचार करना चाहिए। इसमें साफ पानी की उपलब्धता, खाद्य सामग्री का सुरक्षित भंडारण, खाना बनाने और परोसने की स्वच्छता, कचरा निस्तारण, हाथ धोने की व्यवस्था तथा इस्तेमाल होने वाले बर्तनों की सफाई जैसे मानकों को अनिवार्य किया जा सकता है। साथ ही खाद्य विक्रेताओं के लिए आसान पंजीकरण और नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था भी होनी चाहिए। किसी भी सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार के कारण खाद्य सुरक्षा से समझौता नहीं होना चाहिए।
स्ट्रीट फूड में इस्तेमाल होने वाले तेल, मसाले, दूध, पनीर, मांस, पानी और अन्य खाद्य सामग्री की गुणवत्ता की नियमित जांच बेहद जरूरी है। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि खाद्य सामग्री किस स्रोत से खरीदी जा रही है, उसे किस तरह रखा जा रहा है और खाना तैयार करने वाला व्यक्ति स्वच्छता के निर्धारित मानकों का पालन कर रहा है या नहीं। कई बार खराब या दूषित खाद्य पदार्थ खाने से लोगों के बीमार पड़ने की खबरें सामने आती हैं। गंभीर मामलों में खाद्य विषाक्तता जानलेवा भी हो सकती है। ऐसे मामलों में केवल दुकान संचालक को दोषी ठहराने के बजाय यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि संबंधित इलाके में निगरानी और निरीक्षण की जिम्मेदारी किस विभाग की थी और क्या नियमित जांच वास्तव में की गई थी।
स्ट्रीट फूड पर पूरी तरह रोक लगाना समाधान नहीं है। बदलते समय के साथ स्ट्रीट फूड संस्कृति भी बदल रही है। इसलिए इसके नियमन के लिए पुराने और बिखरे हुए प्रावधानों के बजाय एक स्पष्ट, व्यावहारिक और जवाबदेह व्यवस्था पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। स्ट्रीट फूड कारोबार को बंद करना इसका समाधान नहीं है। जरूरत इस बात की है कि इसके लिए स्पष्ट और व्यावहारिक नियमावली बनाई जाए। प्रत्येक दुकान या ठेले का पंजीकरण हो, खाद्य सुरक्षा संबंधी प्रशिक्षण दिया जाए, स्वच्छता के मानक तय हों और समय-समय पर खाद्य सामग्री के नमूने लेकर प्रयोगशाला में जांच कराई जाए। इसके साथ ही स्थानीय निकाय, खाद्य सुरक्षा विभाग और पुलिस की जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से निर्धारित की जानी चाहिए। पुलिस का काम वसूली नहीं, बल्कि व्यवस्था बनाए रखना है, जबकि खाद्य विभाग का काम नमूने लेकर जांच करना और लोगों को जागरूक करना है।
अब समय आ गया है कि स्ट्रीट फूड के लिए स्मार्ट वेंडिंग जोन बनाए जाएं, जहां पानी, बिजली और कचरा प्रबंधन की सुविधा हो। हर विक्रेता को एक पहचान पत्र मिले और ग्राहक क्यूआर कोड स्कैन करके यह देख सके कि इस ठेले की आखिरी जांच कब हुई थी। इससे ईमानदार विक्रेता को सम्मान मिलेगा और मिलावट करने वालों पर रोक लगेगी।
स्ट्रीट फूड सिर्फ भोजन नहीं है। यह भारत की संस्कृति है, यह रोजगार है और यह स्वाद की पहचान भी है। इसे डराकर नहीं, सुधारकर चलाना होगा। नए सिरे से नियमन की जरूरत है, ताकि ठेले पर बिकने वाला स्वाद सेहत के साथ भी समझौता न करे।














