रियासी, 29 सितंबर।
चिनाब नदी की गहरी घाटी में 359 मीटर की ऊंचाई पर बना चिनाब रेलवे ब्रिज भारतीय इंजीनियरिंग की उल्लेखनीय उपलब्धियों में शामिल है। दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे पुल के रूप में पहचाने जाने वाले इस पुल की ऊंचाई एफिल टावर से करीब 35 मीटर अधिक है। परियोजना को वर्ष 2003 में मंजूरी मिली थी और इसे 2009 तक पूरा करने का लक्ष्य था, लेकिन दुर्गम भूगोल, सुरक्षा चुनौतियों, डिजाइन में बदलाव और मौसम की कठिन परिस्थितियों के कारण निर्माण पूरा होने में करीब 22 वर्ष लगे। करीब 1,486 करोड़ रुपये की लागत से तैयार पुल की लंबाई 1,315 मीटर है और इसके निर्माण में लगभग 28,660 मीट्रिक टन इस्पात का इस्तेमाल हुआ है। इसे 120 वर्षों की सेवा अवधि को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है और यह 266 किलोमीटर प्रति घंटे तक की हवाओं तथा उच्च भूकंपीय गतिविधियों का सामना करने में सक्षम है।
चिनाब घाटी में निर्माण के दौरान इंजीनियरों को भूस्खलन, बदलते मौसम, खिसकती चट्टानों, तेज हवाओं, बारिश, बर्फबारी और घने कोहरे जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कई बार भूस्खलन के कारण पहले किया गया काम दोबारा करना पड़ा। निर्माण स्थल तक शुरुआती दौर में सामग्री और उपकरण पहुंचाने के लिए खच्चरों और घोड़ों का इस्तेमाल किया गया, बाद में भारी मशीनरी के लिए विशेष सड़कें तैयार की गईं। ऊंची चट्टानों पर सर्वेक्षण से लेकर नदी के ऊपर स्टील के बड़े हिस्सों को जोड़ने तक कई काम बेहद कठिन परिस्थितियों में किए गए। भारतीय रेलवे ने दोनों पहाड़ियों के बीच विशाल आर्च को जोड़ने के लिए विशेष केबल क्रेन तकनीक का इस्तेमाल किया। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और भूकंप संवेदनशील क्षेत्र के बावजूद परियोजना पूरी हुई। आज इस पुल से गुजरने वाली ट्रेन चिनाब घाटी में रेल संपर्क को मजबूत करने के साथ इस चुनौतीपूर्ण निर्माण परियोजना की तकनीकी उपलब्धि को भी दर्शाती है।














