भोपाल, 30 सितंबर।
भोपाल रेल मंडल के सांसदों की बैठक को ग्यारह माह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन बैठक में दिए गए एक दर्जन से ज्यादा सुझावों पर अब तक अमल नहीं हुआ है। यह स्थिति रेल प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़ा करती है। सांसद जनता के प्रतिनिधि होते हैं और उनकी बैठक केवल औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। बैठक में दिए गए सुझावों पर समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन भोपाल में स्थिति इसके उलट है।
भोपाल स्टेशन पर यात्री कष्ट पर कष्ट झेलते हैं। ट्रेनों के समय पर नहीं आने से यात्रियों की परेशानी बढ़ती रहती है। कई यात्रियों को अपनी यात्रा का कार्यक्रम बदलना पड़ता है, जबकि कुछ लोग ट्रेन की अधिक देरी को देखते हुए वैकल्पिक व्यवस्था करने को मजबूर होते हैं। यह स्थिति यात्री सुविधा के दावों पर सवाल खड़े करती है।
भोपाल एक्सप्रेस का मथुरा में ठहराव और रानी कमलापति से पुणे ट्रेन नियमित करने के प्रस्ताव अब भी अधूरे हैं। बैठक में नई ट्रेन शुरू करने, ट्रेनों के ठहराव बढ़ाने, लंबित रेल परियोजनाओं को गति देने और यात्री सुविधाएं बढ़ाने से जुड़े सुझाव दिए गए थे।
इटारसी स्टेशन पर नागपुर-इंदौर त्रिशताब्दी एक्सप्रेस के ठहराव तथा जोधपुर और चेन्नई-देहरादून ट्रेनों का इटारसी तक विस्तार करने के सुझाव भी दिए गए थे। इन पर भी अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है। राज्यरानी एक्सप्रेस को भोपाल के बजाय रानी कमलापति से चलाने तथा सिरोंज-लटेरी-कुरवाई-समसाबाद और रामगंज मंडी-भोपाल नई रेल लाइनों को जल्द शुरू करने के प्रस्ताव भी लंबित हैं।
सांसद बैठक में सुझाव देते हैं, अधिकारी सहमति जताते हैं, लेकिन बाद में फाइल ठंडे बस्ते में चली जाती है। रेलवे को हर तीन माह में सांसदों के सुझावों की समीक्षा करनी चाहिए और लंबित मामलों का कारण बताना चाहिए। सांसदों के सुझाव केवल राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि जनता की आवाज हैं। अब समय आ गया है कि फाइलों से निकलकर इन सुझावों को पटरी पर उतारा जाए।













