लखनऊ, 30 सितंबर।
उत्तर प्रदेश की दस राज्यसभा सीटों पर होने वाला चुनाव सिर्फ एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले शक्ति प्रदर्शन का बड़ा मंच है। जो दल राज्यसभा में ज्यादा सीटें जीतेगा, वही लखनऊ की लड़ाई में मनोवैज्ञानिक बढ़त ले लेगा। भाजपा इस समय क्लीन स्वीप के मूड में दिख रही है और इसका कारण सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि उसकी रणनीति भी है।
संख्या का खेल तो बहाना है, असली खेल मन का है। विधानसभा में एनडीए के पास करीब 289 वोट हैं और एक सीट जीतने के लिए 37 वोट चाहिए। इस हिसाब से सात सीटों का गणित भाजपा के पक्ष में है, लेकिन राजनीति गणित से नहीं, मन से चलती है। सात सीट जीतना भाजपा के लिए संतोष नहीं है। उसे आठवीं सीट चाहिए, क्योंकि आठ सीट का मतलब विपक्ष का पूरी तरह सफाया और बसपा का राज्यसभा से बाहर होना है।
बसपा के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है। मायावती की पार्टी के लिए यह चुनाव सबसे कठिन है। कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता पर राज करने वाली पार्टी के पास आज विधानसभा में कोई विधायक नहीं है और राज्यसभा की एक सीट भी हाथ से जाने वाली है। यह सिर्फ एक सीट का जाना नहीं है, बल्कि एक विचारधारा का संसद के उच्च सदन से गायब होना है। जब बसपा का कोई सांसद राज्यसभा में नहीं होगा तो दलित राजनीति की आवाज कौन उठाएगा, यह सवाल दलित समाज के लिए भी बड़ा है।
समाजवादी पार्टी के सामने दोहरा संकट है। उसके पास संख्या तो है, लेकिन एकजुटता की चुनौती भी है। उसके पास करीब 101 विधायक हैं और कांग्रेस के समर्थन के साथ वह दो सीटें जीतने की स्थिति में है। लेकिन क्या अखिलेश यादव अपने सभी विधायकों को एकजुट रख पाएंगे? पिछली बार भी क्रॉस वोटिंग ने समाजवादी पार्टी को नुकसान पहुंचाया था। इस बार भी भाजपा की नजर समाजवादी पार्टी के नाराज विधायकों पर है।
भाजपा क्यों चाहती है आठवीं सीट? भाजपा को आठवीं सीट इसलिए चाहिए क्योंकि वह राज्यसभा में अपने प्रभाव को और मजबूत करना चाहती है। केंद्र में कई ऐसे कानून हैं, जिन पर राज्यसभा में समर्थन महत्वपूर्ण होता है। उत्तर प्रदेश से आठ सांसद आने पर भाजपा का संख्यात्मक आधार और मजबूत होगा। दूसरा कारण यह है कि भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि उत्तर प्रदेश में उसे चुनौती देना आसान नहीं है। सात सीट जीतना सामान्य बात होगी, आठ सीट जीतना असाधारण संदेश होगा।
विधायकों की मंडी या लोकतंत्र की मजबूरी। राज्यसभा चुनाव में सबसे कड़वा सच यह है कि यहां विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगते हैं और विचारों के बजाय वोट की कीमत की चर्चा होने लगती है। उत्तर प्रदेश में हर बार राज्यसभा चुनाव से पहले विधायकों की बाड़ेबंदी की खबरें आती हैं। होटलों में रोका जाता है और फोन छीन लिए जाने तक के आरोप लगते हैं। यह लोकतंत्र के लिए चिंता की बात है। जब एक वोट की कीमत 37 विधायक होती है तो हर विधायक खुद को राजा समझने लगता है।
क्लीन स्वीप का मनोविज्ञान भी महत्वपूर्ण है। भाजपा अगर आठ सीट जीत जाती है तो इसका असर सिर्फ दिल्ली में नहीं, बल्कि हर जिले में होगा। कार्यकर्ताओं में यह भाव आएगा कि उनकी पार्टी अभी भी मजबूत है और विपक्ष में निराशा फैलेगी। क्लीन स्वीप का मनोविज्ञान ही ऐसा होता है कि जीत जीत को खींचती है और हार हार को बुलाती है। इसलिए भाजपा इस चुनाव को विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल मानकर लड़ रही है।
क्या यह लोकतंत्र के लिए ठीक है? एक ही पार्टी का राज्यसभा में इतना बड़ा दबदबा लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। उच्च सदन का काम ही है कि वह सरकार को रोक सके, टोक सके। अगर सभी सांसद एक ही पार्टी के होंगे तो फिर उच्च सदन का महत्व ही कम हो जाएगा। विपक्ष का होना जरूरी है, भले ही वह कमजोर ही क्यों न हो। बसपा का बाहर होना और समाजवादी पार्टी का सिमटना उत्तर प्रदेश की विविधता के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
राज्यसभा चुनाव को पैसे और प्रभाव से मुक्त करना होगा। इसके लिए मतदान प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने और क्रॉस वोटिंग पर कड़े नियम लागू करने की जरूरत है। साथ ही जनता को भी यह समझना होगा कि राज्यसभा का चुनाव किस तरह होता है और उनका चुना हुआ विधायक किसे वोट दे रहा है। पारदर्शिता ही इस गंदगी को साफ कर सकती है।
भाजपा सात सीट जीतेगी या आठ, सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश की राजनीति अब एक ही रंग में रंग जाएगी? क्या विपक्ष के पास इतनी ताकत बचेगी कि वह आने वाले विधानसभा चुनाव में चुनौती दे सके? राज्यसभा का यह चुनाव विधानसभा चुनाव का ट्रेलर है और ट्रेलर में ही अगर एक ही हीरो दिखेगा तो पूरी फिल्म का मजा कैसे आएगा? लोकतंत्र में जीत जरूरी है, लेकिन जीत के साथ विपक्ष का जिंदा रहना भी उतना ही जरूरी है।














