देहरादून, 30 सितंबर।
उत्तराखंड को यूं ही देवभूमि नहीं कहा जाता। यहां का कण-कण आस्था से जुड़ा है। बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे धाम केवल मंदिर नहीं हैं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का आधार हैं। यहां की हवा में मंत्र है, यहां के पानी में मोक्ष है और यहां की जमीन पर भगवान के चरणों की धूल है। ऐसे में जब इस पवित्र भूमि पर ऐसे आयोजन होने लगें, जो उसकी मर्यादा के खिलाफ हों, तो चिंता होना स्वाभाविक है।
हाल में बद्रीनाथ में एक संगीत कार्यक्रम को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। कहा गया कि पवित्र स्थल पर इस तरह के शोर-शराबे वाले कार्यक्रम नहीं होने चाहिए। यह मांग सिर्फ किसी एक नेता या दल की नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति की मांग है, जो संस्कृति को मानता है और धर्म को धरोहर समझता है। देवभूमि में शांतिपूर्ण तरीके से भगवान का भजन होना चाहिए, न कि ऐसा संगीत, जो वहां की आध्यात्मिक ऊर्जा को भंग कर दे। पवित्रता केवल पत्थर की नहीं, भाव की भी है।
कई लोग कहते हैं कि संगीत तो भक्ति का ही रूप है, लेकिन सवाल संगीत का नहीं, बल्कि उसकी प्रकृति का है। बद्रीनाथ धाम कोई मनोरंजन स्थल नहीं है। वहां हजारों लोग बड़ी कठिन यात्रा करके मोक्ष की कामना लेकर आते हैं। वहां लाउडस्पीकर पर फिल्मी धुन बजाना या नाच-गाना करना आस्था की भावना को ठेस पहुंचा सकता है। अगर आज बद्रीनाथ में इसकी अनुमति दी गई तो कल केदारनाथ में भी यही होगा और फिर धीरे-धीरे हमारे धाम पर्यटन स्थल बनकर रह जाएंगे।
देवभूमि की पवित्रता केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय भी है। हिमालय बहुत संवेदनशील है। यहां जोर से बजने वाले साउंड सिस्टम से न केवल ध्वनि प्रदूषण फैलता है, बल्कि वन्य जीवन पर भी असर पड़ता है। पहले ही चार धाम यात्रा में क्षमता से ज्यादा भीड़ आ रही है, कचरा बढ़ रहा है और अब अगर इस तरह के आयोजन भी शुरू हो गए तो हिमालय की गोद और ज्यादा प्रदूषित होगी।
उत्तराखंड सरकार से ऐसे कार्यक्रमों पर रोक लगाने की मांग की जा रही है और यह मांग जायज है। सरकार को चाहिए कि वह देवभूमि की पवित्रता बनाए रखने के लिए एक स्पष्ट नीति बनाए। मंदिर परिसर और उसके आसपास के एक किलोमीटर के दायरे में किसी भी प्रकार के मनोरंजन वाले संगीत कार्यक्रम की अनुमति न दी जाए। केवल भजन-कीर्तन और शास्त्रीय संगीत को ही अनुमति मिले। आयोजन की अनुमति देने से पहले स्थानीय पुजारियों और धर्माचार्यों से राय लेना अनिवार्य किया जाए। चार धाम यात्रा मार्ग पर ध्वनि सीमा तय की जाए और उसका सख्ती से पालन कराया जाए।
संस्कृति को बचाने के लिए हमें यह समझना होगा कि संस्कृति हमारी धरोहर है। हम इसे नाच-गाकर नहीं, बल्कि मौन और साधना से बचा सकते हैं। देवभूमि में शंख बजना भी एक अनुशासन में होना चाहिए, शोर नहीं होना चाहिए। अगर हम आज इस पवित्रता को नहीं बचाएंगे तो कल हमारी आने वाली पीढ़ी पूछेगी कि आपने देवभूमि को बाजार क्यों बनने दिया।
सरकार को यह भी तय करना होगा कि वह भक्त चाहती है या पर्यटक। भक्त आता है दर्शन करने, पर्यटक आता है मौज-मस्ती करने। अगर हम पर्यटक को लुभाने के लिए धामों में डिस्को जैसे आयोजन करेंगे तो भक्त वहां से दूर हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि धाम को धाम ही रहने दिया जाए, उसे इवेंट प्लेस न बनाया जाए।
देवभूमि की पवित्रता बचाने के लिए कड़े कदम उठाने का समय आ गया है। यह काम केवल सरकार का नहीं, बल्कि हम सबका है। हर यात्री को भी यह प्रण लेना होगा कि वह वहां जाकर शोर नहीं करेगा, कचरा नहीं फैलाएगा और आस्था का सम्मान करेगा। तभी देवभूमि बची रहेगी और तभी भगवान भी प्रसन्न रहेंगे।













