चेन्नई, 30 सितंबर।
तमिलनाडु सरकार ने पिछले चार महीनों में चार बड़े फैसलों पर यू टर्न लिया है। यह सामान्य घटना नहीं है, बल्कि यह बताती है कि नई विजय सरकार के सामने सत्ता चलाना कितना कठिन है। एक तरफ उसे अपनी अलग पहचान बनानी है, दूसरी तरफ उसे सहयोगी दलों, मछुआरों, छात्रों और प्रेस को भी साथ लेकर चलना है। इन चार यू टर्न में सत्ता का यही अंतर्विरोध दिखाई देता है।
पूर्व में हिरासत और गुंडा एक्ट के मामले के बाद विजय सरकार के सत्ता में आते ही राज्य सलाहकार बोर्ड की सिफारिश पर सवुक्कू शंकर की तत्काल रिहाई का सरकारी आदेश जारी किया गया था। पिछली सरकार पर आरोप था कि उसने आलोचनात्मक पत्रकारिता को दबाने के लिए कड़े कानूनों का उपयोग किया था। सवुक्कू शंकर लगातार सरकार की आलोचना करते थे, इसलिए उन्हें जेल में डाला गया था। नई सरकार ने आते ही उन्हें रिहा करके यह संदेश दिया कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में है। यह पहला बड़ा यू टर्न था, जिसने पिछली सरकार के फैसले को पलट दिया।
कॉलेजों में छात्रों के राजनीतिक प्रदर्शनों पर रोक लगाने का आदेश जारी हुआ था। सरकार का तर्क था कि शिक्षा संस्थानों को राजनीति से दूर रखा जाए, लेकिन इस आदेश ने पूरे राज्य में विरोध खड़ा कर दिया। छात्र संगठनों और वाम दलों ने कड़ा विरोध किया। छात्रों ने कहा कि कॉलेज ही वह जगह है, जहां लोकतंत्र सीखा जाता है। अगर वहीं बोलने पर रोक लगेगी तो तानाशाही आएगी। भारी दबाव के बाद सरकार ने तुरंत इस आदेश को वापस ले लिया। यह दूसरा यू टर्न था, जिसने दिखाया कि युवा शक्ति के दबाव में सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा।
विधानसभा में परिसीमन और जोनल काउंसिल में सीटों के अनुपात को लेकर मंत्रियों के बयानों और रुख पर स्पष्टीकरण देने का घटनाक्रम भी राजनीतिक यू टर्न के रूप में सामने आया। दरअसल, केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित परिसीमन को लेकर दक्षिण के राज्यों में यह आशंका है कि उनकी सीटें कम हो जाएंगी। तमिलनाडु सरकार के कुछ मंत्रियों ने इस पर कड़े बयान दिए थे, लेकिन बाद में जब सहयोगी दलों और कानूनी सलाहकारों ने बताया कि इस तरह के बयान से केंद्र से टकराव बढ़ सकता है तो सरकार को अपने ही मंत्रियों के बयानों पर स्पष्टीकरण देना पड़ा। यह एक तरह का राजनीतिक यू टर्न था, जहां सरकार ने आक्रामक रुख से पीछे हटकर संतुलित रुख अपनाया।
पट्टिनापक्कम में एक हजार दो सौ करोड़ रुपये की लागत से नए सचिवालय परिसर के निर्माण का सरकारी आदेश आया था। सरकार चाहती थी कि समुद्र किनारे एक आधुनिक सचिवालय बने, लेकिन मछुआरों और सहयोगी दलों के भारी विरोध के बाद सरकार ने ही इस पर समीक्षा और रोक की बात कही। मछुआरों का कहना था कि इस निर्माण से उनका रोजगार प्रभावित होगा और समुद्र के पर्यावरण को नुकसान होगा। सहयोगी दलों ने भी कहा कि इतनी बड़ी राशि सचिवालय पर खर्च करने के बजाय उसे बाढ़ नियंत्रण और शिक्षा पर खर्च किया जाना चाहिए। इस विरोध के बाद सरकार को अपना ड्रीम प्रोजेक्ट रोकना पड़ा।
इन चार यू टर्न से चार संदेश सामने आते हैं। तमिलनाडु में प्रेस को दबाया नहीं जा सकता। सवुक्कू शंकर की रिहाई ने यह संदेश दिया। छात्रों को राजनीति से पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता। परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बिना सोचे बयान नहीं दिया जा सकता। विकास के नाम पर मछुआरों के हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
विजय सरकार नई है और उसे फिल्मी लोकप्रियता से राजनीतिक परिपक्वता तक का सफर तय करना है। चार यू टर्न से एक बात साफ है कि सरकार के सामने अभी नीति और निर्णयों में स्थिरता की चुनौती है। वह फैसले लेती है और फिर विरोध होने पर पीछे हटती है। यह शैली लंबे समय तक नहीं चल सकती। सरकार को चाहिए कि कोई भी आदेश जारी करने से पहले सभी हितधारकों से बात करे।
कई लोग यू टर्न को कमजोरी मानते हैं, लेकिन लोकतंत्र में फैसला बदलना हमेशा कमजोरी नहीं होता। जो सरकार अपनी गलती मानकर फैसला वापस लेती है, वह जनता की आवाज सुनने का संकेत देती है। तानाशाह सरकारें कभी पीछे नहीं हटतीं। तमिलनाडु के इन चार यू टर्न ने यह दिखाया कि वहां जनता की आवाज का महत्व है। तमिलनाडु सरकार के चार बड़े फैसलों पर यू टर्न लेना केवल खबर नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक पाठ है। यह पाठ बताता है कि सत्ता में आते ही बड़े-बड़े वादे करना आसान है, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारना कठिन है। सवुक्कू शंकर की रिहाई से लेकर पट्टिनापक्कम सचिवालय तक हर यू टर्न के पीछे जनता का दबाव है और यही लोकतंत्र की ताकत है।














