भोपाल, 30 सितंबर।
भोपाल में एक नई चिंता अब घर-घर में दस्तक दे रही है और वह चिंता है अकेले रहने वाले बुजुर्गों की सुरक्षा की। पहले शहर में संयुक्त परिवार होते थे। घर में दादा-दादी, चाचा-चाची सब साथ रहते थे, लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। बच्चे नौकरी के लिए बाहर चले गए हैं। कोई बेंगलुरु में है तो कोई अमेरिका में और पीछे रह गए हैं बूढ़े माता-पिता, अकेले अपने उसी मकान में, जहां कभी किलकारियां गूंजती थीं। अब वहां सन्नाटा रहता है।
भोपाल में अकेले रहने वाले बुजुर्गों और बुजुर्ग दंपतियों की सुरक्षा का सबसे बड़ा सवाल उनके घर के अंदर से जुड़ा है। परिवार के सदस्य नौकरी, कारोबार और पढ़ाई के कारण दूसरे शहरों में रहते हैं। ऐसे में बुजुर्ग घर के कामकाज और देखभाल के लिए केयरटेकर, घरेलू नौकर या बाई रखते हैं और धीरे-धीरे घर की चाबी किसी और को सौंप देते हैं। यही चाबी कभी-कभी खतरा बन जाती है।
पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि वेरिफिकेशन की रफ्तार कितनी धीमी है। कोलार थाने में दो महीने में 450 वेरिफिकेशन लंबित हैं। अशोका गार्डन थाना छात्र बहुल क्षेत्र है, लेकिन यहां केवल 115 आवेदन आए हैं। गोविंदपुरा में दो महीने में 200 वेरिफिकेशन हुए हैं। बागसेवनिया में छह महीने में 400 और पूरे साल में 1,000 आवेदन मिले हैं। हबीबगंज में छह महीने में 500 से ज्यादा आवेदन आए हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि लोग अभी भी जागरूक नहीं हैं। किरायेदारों, घरेलू नौकरों और कर्मचारियों के सत्यापन की ऑनलाइन व्यवस्था होने के बावजूद पुलिस सभी का वेरिफिकेशन नहीं करवा पाती है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि हॉस्टल और लॉज संचालक किरायेदारों की जानकारी देते ही नहीं हैं।
वेरिफिकेशन इसलिए जरूरी है क्योंकि घर में काम करने वाला नौकर दिनभर आपके घर में रहता है। वह आपके बच्चों के बारे में जानता है, आपकी अलमारी कहां है, यह भी जानता है और उसका कोई रिकॉर्ड पुलिस के पास नहीं है तो यह कितना बड़ा खतरा हो सकता है, इसे समझना जरूरी है। भोपाल में पिछले कुछ वर्षों में बुजुर्गों के साथ हुई लूट या हत्या की घटनाओं में ज्यादातर मामलों में घर के ही नौकर या किरायेदार का हाथ होने की बात सामने आई है। इसलिए पुलिस बार-बार कहती है कि वेरिफिकेशन करवाएं, लेकिन लोग इसे टाल देते हैं।
अकेले बुजुर्ग दंपति की समस्या सिर्फ सुरक्षा की नहीं है, बल्कि अकेलेपन की भी है। दिनभर घर में कोई बात करने वाला नहीं होता। टीवी ही उनका साथी होता है। बच्चे फोन पर कभी-कभी बात कर लेते हैं, लेकिन वह बातचीत दिल का बोझ कम नहीं करती। कई बार बुजुर्ग बीमार पड़ जाते हैं और घर में कोई देखने वाला नहीं होता। पड़ोसी भी अब पहले जैसे नहीं रहे। हर कोई अपने घर में बंद है। ऐसे में अकेले बुजुर्ग दंपति का जीवन बहुत कठिन हो जाता है।
इस समस्या का समाधान सिर्फ पुलिस नहीं कर सकती। समाज को भी आगे आना होगा। हर मोहल्ले में एक बुजुर्ग सुरक्षा समिति बननी चाहिए, जो रोज शाम को अकेले रहने वाले बुजुर्गों का हालचाल पूछे। पुलिस को चाहिए कि वह वेरिफिकेशन को आसान बनाए। ऑनलाइन सिस्टम को और सरल किया जाए और थानों में एक अलग डेस्क हो, जो सिर्फ बुजुर्गों के लिए काम करे।
भोपाल झीलों का शहर है, एक सुकून का शहर है, लेकिन अगर यहां के बुजुर्ग ही सुरक्षित नहीं रहेंगे तो इस सुकून का क्या मतलब है? अकेले बुजुर्ग दंपति हमारे ही माता-पिता हैं। उनका सम्मान और उनकी सुरक्षा हमारी पहली जिम्मेदारी है। अगर आज हमने उनकी सुध नहीं ली तो कल जब हम बुजुर्ग होंगे तो हमारे साथ भी यही होगा।
यह समय है कि हम अपनी सोच बदलें। हम अपने घर के नौकर, किरायेदार और केयरटेकर का वेरिफिकेशन करवाएं। हम अपने मोहल्ले के अकेले बुजुर्गों का ध्यान रखें। हम पुलिस को सहयोग करें और अपने माता-पिता को अकेला न छोड़ें। भोपाल में अकेले बुजुर्ग दंपति की सुरक्षा का सवाल सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं है। यह हमारे संस्कारों का सवाल है। यह हमारे भविष्य का सवाल है। अगर हमने अभी ध्यान नहीं दिया तो वह दिन दूर नहीं, जब भोपाल में हर घर में एक अकेला बुजुर्ग होगा और उसके पास सिर्फ एक सवाल होगा, मेरा अपना कौन है?














