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संपादकीय
01 Oct, 2026

वोट चोरी का आरोप और लोकतंत्र की कसौटी

मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी के आरोपों के बीच बेंगलुरु और दिल्ली के मामलों ने चुनावी प्रक्रिया, जांच और मतदाताओं के भरोसे को लेकर बहस तेज कर दी है।

नई दिल्ली, 1 अक्टूबर। बेंगलुरु से दिल्ली तक एक ही शोर

पिछले कुछ महीनों से देश की राजनीति में एक नया शोर गूंज रहा है, वोट चोरी का आरोप। यह शोर बेंगलुरु के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र से शुरू हुआ और दिल्ली की यमुना पार की कॉलोनियों तक पहुंच गया। एक तरफ आरोप लगाया जा रहा है कि मतदाता सूची में हेरफेर किया गया है, तो दूसरी तरफ यह दावा किया जा रहा है कि एक ही घर में 80 वोट जोड़ दिए गए हैं। यह मामला सिर्फ एक विधानसभा का नहीं, बल्कि पूरे चुनावी सिस्टम पर सवाल खड़ा करने वाला बन गया है।

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में कांग्रेस नेता राहुल गांधी हैं। उन्होंने पहले बेंगलुरु की घटना का उल्लेख किया और कहा कि वहां वोट चोरी हुई है। बाद में दिल्ली की एक कॉलोनी के 728 लोगों का जिक्र करते हुए कहा कि वे लोग उसी मकान में समय-समय पर रहते हैं, लेकिन उनका वोट कटवा दिया गया है। उनका कहना है कि यह सिर्फ वोट कटवाने का मामला नहीं, बल्कि गहन पुनरीक्षण के नाम पर चुनिंदा लोगों को निशाना बनाने की साजिश है। उनका आरोप है कि यमुना पार के यमुना डूब क्षेत्र में रहने वाले लोगों की झुग्गियां तोड़ी गईं और फिर उनके वोट भी काट दिए गए, ताकि वे चुनाव में हिस्सा ही न ले सकें।

इस कहानी में एक और मोड़ तब आया, जब एक एसडीएम को फोन लगाया गया। वहां के अधिकारियों ने बताया कि वहां कोई घर या झुग्गी नहीं है तो वोट कैसे रहेगा? इस बयान को आधार बनाकर यह कहा गया कि प्रशासन खुद मान रहा है कि वहां लोग नहीं रहते, जबकि दावा है कि वहां सालों से लोग रह रहे हैं और वोट डालते आ रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी उन लोगों ने वोट डाला था। अब सवाल यह है कि अगर पिछले चुनाव तक वोट था तो इस साल अचानक गायब कैसे हो गया? क्या यह मानवीय भूल है या सोची-समझी रणनीति है?

वोटर लिस्ट का गहन पुनरीक्षण एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी अवैध मतदाता सूची में न रहे और कोई भी वैध मतदाता छूट न जाए। निर्वाचन आयोग की आधिकारिक प्रक्रिया के अनुसार पुनरीक्षण के दौरान दावे और आपत्तियां आमंत्रित की जाती हैं तथा राजनीतिक दलों को भी संबंधित सूचियां उपलब्ध कराई जाती हैं। लेकिन जब इस प्रक्रिया का इस्तेमाल चुनिंदा इलाकों में चुनिंदा लोगों के वोट काटने के लिए किए जाने का आरोप लगे तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर सवाल बन जाता है। यमुना पार की घटना में आरोप है कि जिन लोगों के पास पहले से पहचान पत्र हैं, उनके वोट भी काट दिए गए हैं और जब वे इसकी शिकायत लेकर जाते हैं तो उन्हें धमकाया जाता है कि उनका नाम और पद लिखकर भेजो, मैं दूसरे तरीके से जवाब दूंगा। यह भाषा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है।

इस पूरे मामले ने भाजपा और कांग्रेस के बीच एक नया मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस का कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर अपनी मुहर लगाने के बाद अब वोटर लिस्टों पर भी कब्जा करने की कोशिश हो रही है, जबकि सत्ता पक्ष का कहना है कि यह सिर्फ हार का बहाना है और जब से राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने ईवीएम पर सवाल उठाए हैं, तब से वे हर हार के बाद नया बहाना ढूंढते हैं। सच्चाई क्या है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इतना तय है कि वोटर लिस्ट का मुद्दा अब राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है।

आम मतदाता इस पूरे शोर में खुद को ठगा-सा महसूस कर रहा है। वह सोचता है कि अगर उसका वोट ही सुरक्षित नहीं है तो फिर लोकतंत्र का मतलब क्या है? कई जगहों पर लोगों ने कहा कि वे सालों से एक ही जगह रह रहे हैं, लेकिन उनका नाम सूची से गायब कर दिया गया है। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि उनके घर का नंबर शून्य लिखा था और वोट लिस्ट में उस घर में 80 वोट पाए गए थे। यह सुनकर आम आदमी के मन में डर पैदा होता है कि क्या उसका वोट भी चोरी हो जाएगा?

इस पूरे विवाद में सबसे अहम भूमिका चुनाव आयोग की है। चुनाव आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है और चुनाव प्रक्रिया के संचालन के साथ मतदाता सूची से जुड़ी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी भी उसी की है। चुनाव हारने या राजनीतिक नुकसान के बाद मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठना कोई नई बात नहीं है, लेकिन गंभीर आरोपों की विश्वसनीयता केवल आरोप लगाने से नहीं, ठोस प्रमाणों से तय होती है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल या नेता को यदि मतदाता सूची में गड़बड़ी का दावा है तो उसे प्रमाणों के साथ सामने रखना चाहिए। दूसरी ओर, चुनाव आयोग को भी अपनी प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता बनाए रखते हुए जहां शिकायत हो, वहां निष्पक्ष जांच और तथ्यों को सार्वजनिक करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। सरकार और चुनावी तंत्र को राजनीतिक दबाव से अप्रभावित रहते हुए अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियां ईमानदारी और दृढ़ता से निभाते रहना चाहिए। लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता किसी एक चुनाव या किसी एक दल से बड़ी होती है, इसलिए उसे बनाए रखना सभी की साझा जिम्मेदारी है।

वोट चोरी का आरोप लगाना आसान है, लेकिन उसे साबित करना जरूरी है। राहुल गांधी को यह भी बताना होगा कि उनके पास जो सबूत हैं, वे कितने पुख्ता हैं और सरकार को भी यह बताना होगा कि उसने वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण में क्या कदम उठाए हैं। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब हर वोट की कीमत समझी जाएगी और हर मतदाता को यह भरोसा होगा कि उसका वोट सुरक्षित है। अगर यह भरोसा टूट गया तो फिर चुनाव का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। इसलिए राजनीतिक आरोपों का जवाब भी तथ्यों और प्रमाणों से होना चाहिए और सभी संबंधित संस्थाओं को अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्पक्षता से निभानी चाहिए। चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता के भरोसे की रक्षा किसी भी राजनीतिक विवाद से ऊपर है। यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।

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