देश में राजनीतिक दल बनाना जितना आसान है, उतना ही आसान हो गया है उस दल की आड़ में काले धन को सफेद करना। गुजरात में सामने आए ताजा मामले ने इस कड़वी सच्चाई को फिर से उजागर कर दिया है, जहां तीन गैर-मान्यता प्राप्त पंजीकृत दलों पर लगभग 1,870 करोड़ रुपये के फर्जी चंदे के जरिए सरकारी खजाने को 560 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान पहुंचाने का आरोप लगा है। यह कोई छोटी-मोटी हेराफेरी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश है, जिसमें दान की रसीदें बेची गईं और बदले में नकद पैसा लौटाया गया। इस पूरे खेल में न तो कोई विचारधारा है, न कोई कार्यकर्ता, न कोई जनसेवा, बल्कि सिर्फ कमीशन का गणित है।
इस धंधे को समझना बहुत जरूरी है। आयकर कानून में राजनीतिक दलों को दिए गए दान पर 100 प्रतिशत छूट का प्रावधान है। यह प्रावधान इसलिए बनाया गया था ताकि आम नागरिक और व्यापारी साफ-सुथरी राजनीति को मदद कर सकें, लेकिन कुछ चालाक लोगों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया। खेल ऐसा है कि व्यापारी चेक या आरटीजीएस से फर्जी दल को दान देता है, दल उसे दान की रसीद दे देता है, व्यापारी उस रसीद के आधार पर आयकर में छूट ले लेता है और कुछ दिन बाद वही पैसा शेल कंपनियों के जरिए घुमाकर नकद में वापस कर दिया जाता है। इसमें से दल दो से दस प्रतिशत तक अपना कमीशन रख लेता है। दोनों पक्ष खुश, व्यापारी का टैक्स बच गया और दल की जेब भर गई। नुकसान सिर्फ देश के खजाने का हुआ।
2,800 दलों की भीड़ में असली-नकली की पहचान कौन करे?आज देश में 2,800 से ज्यादा रजिस्टर्ड गैर-मान्यता प्राप्त दल हैं। इनमें से अधिकांश दल सिर्फ चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में जिंदा हैं, जमीन पर उनका कोई अस्तित्व नहीं है। ये दल न कभी रैली करते हैं, न कभी जनसंपर्क करते हैं, लेकिन हर साल अपनी ऑडिट रिपोर्ट में करोड़ों का चंदा दिखा देते हैं। सवाल उठता है कि जब ये दल चुनाव ही नहीं लड़ते या लड़ते भी हैं तो इनके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो जाती है, तो फिर इन्हें इतना चंदा कौन दे रहा है? इसका जवाब ही इस फर्जीवाड़े में छिपा है। चुनाव आयोग के पास इन दलों की मान्यता रद्द करने का अधिकार तो है, लेकिन प्रक्रिया इतनी धीमी है कि जब तक कार्रवाई होती है, तब तक वे कई सौ करोड़ का खेल कर चुके होते हैं।
हम इसे सिर्फ टैक्स चोरी समझकर भूल नहीं सकते। यह लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। राजनीतिक दल लोकतंत्र के मंदिर हैं। लोग उन पर भरोसा करते हैं कि वे देश को दिशा देंगे, लेकिन जब वही दल जाली नोटों की तरह फर्जी रसीदें छापने लगें तो आम आदमी का भरोसा टूट जाता है। यह भरोसा ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है। 1,870 करोड़ रुपये का फर्जी चंदा मतलब यह है कि इतना काला धन सिस्टम में सफेद बनकर घूम रहा था और किसी को भनक तक नहीं लगी। अगर गुजरात पुलिस और आयकर विभाग ने मिलकर जांच न की होती तो यह पैसा आज भी घूम रहा होता।
पंजीकरण की आसान प्रक्रिया में चूक हैसिर्फ सौ लोगों के हस्ताक्षर और कुछ कागजात देकर कोई भी दल बना लेता है। उसके बाद कोई निगरानी नहीं कि वह दल कर क्या रहा है। निगरानी की कमी में है। आयकर विभाग के पास इतना स्टाफ नहीं है कि वह हर दल की ऑडिट रिपोर्ट की गहराई से जांच कर सके। चूक कानून में है। राजनीतिक दलों को मिलने वाली छूट पर कोई ऊपरी सीमा नहीं है। कोई भी व्यक्ति कितनी भी राशि दान में दिखाकर छूट ले सकता है। इसी का फायदा उठाया जाता है। जब तक इन तीनों खामियों को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक हर साल कोई न कोई नया फर्जी दल सामने आता रहेगा।
समाधान के लिए कड़े और व्यावहारिक कदम उठाने होंगेसबसे पहले, जो दल लगातार तीन चुनावों में एक भी सीट पर चुनाव नहीं लड़ता या जिसके सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो जाती है, उसकी मान्यता स्वतः रद्द हो जानी चाहिए। 20 हजार रुपये से अधिक के किसी भी राजनीतिक चंदे को सिर्फ डिजिटल माध्यम से ही स्वीकार किया जाए और उसका मिलान आयकर रिटर्न से किया जाए। यह होना चाहिए कि चुनाव आयोग और आयकर विभाग का एक संयुक्त पोर्टल बने, जहां हर दल को हर चंदे की जानकारी तुरंत अपलोड करनी पड़े। चौथा और सबसे अहम कदम यह है कि चंदा चोरी में शामिल दाता और दल, दोनों के लिए सजा का प्रावधान कठोर किया जाए। सिर्फ जुर्माने से काम नहीं चलेगा, बल्कि जेल का प्रावधान जरूरी है।
यह लड़ाई सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि हम सबकी है। जब तक व्यापारी वर्ग टैक्स बचाने के लिए गलत रास्ता अपनाता रहेगा, तब तक फर्जी दल पैदा होते रहेंगे। हमें समझना होगा कि जो पैसा हम टैक्स के रूप में बचाते हैं, वही पैसा अगर सही हाथों में जाए तो स्कूल, अस्पताल और सड़क बनते हैं, लेकिन अगर फर्जी दलों की जेब में जाए तो वह लोकतंत्र को खोखला करता है। इसलिए हर नागरिक को यह सोचना होगा कि चंदा देना है तो सिर्फ ईमानदार और सक्रिय दल को ही दें और उसकी रसीद की जांच भी करें। सरकार को भी चाहिए कि वह ईमानदार दाताओं को सम्मानित करे, ताकि लोगों में सही रास्ते से दान देने की प्रवृत्ति बढ़े। तभी जाकर यह चंदा मंडी बंद होगी और राजनीति फिर से सेवा का माध्यम बनेगी।














