नई दिल्ली, 1 अक्टूबर।
हाईकोर्ट ने जब कहा कि 10वीं में भी 7वीं, 8वीं और 9वीं की तरह तीसरी भाषा से छूट मिलेगी, तो सिर्फ एक कानूनी पंक्ति नहीं लिखी गई, बल्कि लाखों बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लौट आई। वह बच्चा, जो पहले से दो गैर-मातृ भाषाओं का बोझ ढो रहा था, अब अपनी मौजूदा भाषा में ही अपनी पहचान बनाए रख सकेगा। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी छात्र को उसकी इच्छा के विरुद्ध तीसरी भाषा पढ़ने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। यह फैसला बस्ता हल्का करने का नहीं, बल्कि मन हल्का करने का फैसला है।
भाषा किताब का पन्ना नहीं, दादी की लोरी है। हम भूल जाते हैं कि भाषा सिर्फ अंक लाने का विषय नहीं है। भाषा वह लोरी है जो दादी रात में सुनाती है, वह गीत है जो खेत में किसान गाता है, वह बोली है जिसमें मां पुकारती है। जब हम बच्चे पर तीसरी भाषा का अनावश्यक बोझ डालते हैं तो हम उसे उसकी अपनी लोरी से दूर कर देते हैं। कोर्ट का यह कहना कि छात्र अपनी मौजूदा भाषा का सम्मान जारी रख सकेंगे, इसी भावनात्मक जुड़ाव की जीत है। यह सम्मान सिर्फ भाषा का नहीं, बल्कि उस संस्कृति का है जो उस भाषा में बसती है।
विलुप्त होती आवाजें हमें पुकार रही हैं। आज हमारे देश में 195 से ज्यादा क्षेत्रीय बोलियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। बुंदेलखंडी, बघेलखंडी, गोंडी, भीली, कोरकू, निमाड़ी और मालवी जैसी मीठी बोलियां धीरे-धीरे स्कूलों की किताबों से गायब हो रही हैं। क्या कभी सोचा है कि जब ये बोलियां मर जाएंगी तो उनके साथ कितनी कहानियां, कितने लोकगीत और कितनी कहावतें मर जाएंगी? नई शिक्षा नीति में मातृभाषा में पढ़ाई की बात तो कही गई, लेकिन जमीनी सच यह है कि 28,813 सीबीएसई स्कूलों में से करीब 99 प्रतिशत के पास आज भी नई व्यवस्था लागू करने की पूरी तैयारी नहीं है। ऐसे में तीसरी भाषा की जिद करना अपनी ही जड़ों को काटने जैसा है। राहत के साथ जिम्मेदारी भी आई है।
यह फैसला सिर्फ राहत नहीं, एक बड़ी जिम्मेदारी भी है। केंद्र ने मौजूदा छूटों को खत्म करने के लिए अधिसूचना जारी की थी और कहा था कि स्कूल तैयार हैं, लेकिन कोर्ट में दाखिल हलफनामे और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। अभी भी करीब 12 प्रतिशत स्कूलों में संसाधन पूरे होने बाकी हैं। ऐसे में अगर हम तीसरी भाषा थोपेंगे तो क्या पढ़ाएंगे, कौन पढ़ाएगा और बच्चा क्या सीखेगा? इसलिए कोर्ट की नजर अब स्कूलों की तैयारी पर भी है और यह नजर बहुत जरूरी है।
भारत की आत्मा उसकी भाषाओं में बसती है। हिंदी और अंग्रेजी जरूरी हैं, लेकिन बुंदेलखंड का बच्चा अगर बुंदेलखंडी नहीं जानेगा तो वह अपने ही खेत की मिट्टी से कैसे जुड़ेगा? आदिवासी बच्चा अगर गोंडी नहीं पढ़ेगा तो वह अपने पुरखों के ज्ञान को कैसे आगे ले जाएगा? यह फैसला हमें अवसर देता है कि हम तीन भाषा फॉर्मूले को बोझ न बनाकर सेतु बनाएं, अपनी मातृभाषा और देश की अन्य भाषाओं के बीच, अपनी बोली और किताबी भाषा के बीच।
अब समय है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर क्षेत्रीय भाषाओं को बचाने का संकल्प लें। हर स्कूल में सप्ताह में एक दिन अपनी बोली का दिन हो। हर बच्चे को अपनी क्षेत्रीय भाषा में एक कविता या कहानी लिखने के लिए कहा जाए। स्थानीय लेखकों और बुजुर्गों को स्कूलों में बुलाया जाए, ताकि भाषा किताब से निकलकर जीवन में आए। जब बच्चा अपनी भाषा पर गर्व करेगा तो वह किसी भी भाषा को बोझ नहीं समझेगा, बल्कि खुशी से सीखेगा।
कोर्ट ने बस्ते से एक किताब कम की है, लेकिन दिल में अपनी भाषा के लिए एक जगह बढ़ा दी है। यह छूट नहीं है, अपनी जड़ों की ओर लौटने का न्योता है। तीसरी भाषा से राहत का यह फैसला अगर हमें हमारी विलुप्त होती भाषाओं को बचाने की ओर ले जाता है तो यही सच्ची शिक्षा होगी। भाषा बचेगी तो संस्कृति बचेगी, संस्कृति बचेगी तो भारत बचेगा।













