भोपाल, 02 अक्टूबर।
भोपाल का आखिरी मास्टर प्लान 1995 में आया था, जो 2005 तक के लिए था। उसके बाद से राजधानी बिना किसी वैधानिक नक्शे के ही बढ़ती रही है। इसी बीच शहर ने अपने आप को फैलाया, अवैध कॉलोनियां बनीं, प्लॉट कटे, मकान बने और फिर उन्हीं अवैध निर्माणों को नियमित करने का वादा लेकर हर चुनाव में नेता आते रहे हैं। यह एक अजीब विडंबना है कि जिस सिस्टम का काम शहर को प्लान करना था, वही सिस्टम अनप्लान्ड शहर को नियमित करने का ठेकेदार बन गया। अब तीन दशक बाद गवर्नेंस के मास्टर्स एक नया ड्राफ्ट लेकर आए हैं, जो देखने में बहुत आकर्षक है, लेकिन सवाल वही है, क्या कागज का यह आकर्षण जमीन की कुरूपता को ढक पाएगा?
पुराने वादों की कब्र पर नए शब्दों की इमारत
नए ड्राफ्ट में बड़े-बड़े शब्द गढ़े गए हैं, मेट्रोपॉलिटन रीजन, ग्रोथ कॉरिडोर, एजुकेशन नॉलेज हब, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिटी, यूनिफाइड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी। सुनने में लगता है जैसे भोपाल अब सीधे सिंगापुर बन जाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि ये सब पुराने विचार ही हैं, जिन्हें नए लेबल में पैक किया गया है। ग्रोथ कॉरिडोर कोई नया नहीं, बल्कि वही पुराना बाईपास है, जिस पर वर्षों से निर्माण हो रहे हैं। अब इस पर नियम बनाया गया है कि एक एकड़ से कम जमीन पर विकास की अनुमति नहीं मिलेगी। सोचिए, छोटे किसान या छोटे प्लॉट धारक का क्या होगा? उसके पास आधा एकड़ जमीन है तो वह न तो घर बना सकता है, न बेचने पर सही दाम पा सकता है। या तो वह और जमीन खरीदे या अपनी जमीन किसी बड़े बिल्डर को औने-पौने दाम पर बेच दे। यह नियम बड़े लोगों के लिए कॉरिडोर खोलेगा और छोटे लोगों के लिए दरवाजे बंद करेगा।
मिक्स लैंड यूज यानी जो है, उसी को नाम दे दो
सुप्रीम कोर्ट रहवासी इलाकों में कमर्शियल गतिविधियों को लेकर बहुत सख्त है। सीलिंग की कार्रवाई से बचने के लिए नए प्लान में मिक्स लैंड यूज का फॉर्मूला लाया गया है। सड़क की चौड़ाई के हिसाब से दुकान और ऑफिस को वैध करने की तैयारी है। मतलब, जो अतिक्रमण मौके पर पहले से है, उसे ही अब वैधता का जामा पहना दिया जाएगा। नीति हमेशा आकर्षक होती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुरूप हो जाती है। यही इस प्लान में भी दिख रहा है। टीटी नगर को तोड़कर नया बनाने की योजना पिछले प्लान में भी थी। टीटी नगर तो तोड़ दिया गया, लेकिन वहां निर्माण आज तक पूरा नहीं हुआ। कितनी सड़कें, जो पिछले प्लान में घोषित थीं, आज तक कागज से बाहर नहीं निकलीं। तो फिर नए प्लान की सड़कों पर भरोसा कैसे किया जाए?
स्मार्ट सिटी के खंभों में दौड़ता करंट और सिस्टम की चुप्पी
स्मार्ट सिटी के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च हुए, लेकिन शहर स्मार्ट होने के बदले खतरनाक हो गया। हाल ही में एक व्यक्ति की मौत इलेक्ट्रिक पोल में करंट आने से हो गई। जांच में पता चला कि 38 किलोमीटर के दायरे में 661 पोल में से 400 खतरनाक हालत में हैं। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, आपराधिक लापरवाही है। लेकिन स्मार्ट सिटी कंपनी हो या नगर निगम, कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। जब मौजूदा ढांचे को ही सुरक्षित नहीं रखा जा सकता तो नए एजुकेशन हब और एआई सिटी की कल्पना कितनी खोखली लगती है। पहले जो है, उसे तो ठीक कर लीजिए, फिर नई उड़ान की बात कीजिए।
तालाब, झुग्गी और भोपाल की आत्मा पर चोट
भोपाल की पहचान उसके तालाब हैं, लेकिन तमाम योजनाओं के बाद भी उनमें गंदा पानी मिलना बंद नहीं हुआ। कैचमेंट एरिया में निर्माण कागज पर रुके हैं, लेकिन जमीन पर लगातार हो रहे हैं। दूसरी तरफ हर मुख्यमंत्री ने भोपाल को झुग्गी मुक्त बनाने का ऐलान किया। बाणगंगा जैसी सबसे पुरानी झुग्गी बस्ती के लिए कई प्लान बने, लेकिन एक भी जमीन पर नहीं उतरा। आज भी झुग्गियों की संख्या कम नहीं हुई। जो पक्के मकान बनाए भी गए, वे आवंटन के बाद भी झुग्गी को एक व्यवसाय के रूप में जिंदा रख रहे हैं। इसका मतलब है कि हमने झुग्गी को हटाने की नहीं, बल्कि उसे रोटेट करने की योजना बनाई है।
अदालत की निगरानी और अथॉरिटी का जाल
राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में अंडरटेकिंग दे चुकी है कि नया मास्टर प्लान बिना कोर्ट की अनुमति के जारी नहीं होगा। यह इसलिए, क्योंकि कोर्ट जानती है कि नए प्लान के जरिए सीलिंग को रोकने की कोशिश होगी। मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी और यूनिफाइड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी जैसे नए संस्थान प्रस्तावित हैं। क्या एक और अथॉरिटी बनाने से काम होगा या काम करने की नीयत से होगा? पहले से ही कई विभाग हैं, जिनके बीच तालमेल नहीं है। एक और अथॉरिटी सिर्फ फाइलों का बोझ बढ़ाएगी।
अब क्या होना चाहिए
गंभीर सुझाव यह है कि मास्टर प्लान को पावर प्ले का टूल नहीं बनने दिया जाए। जो प्लान बने, उसका पालन ईमानदारी से हो। प्लान को तोड़ने-मरोड़ने वाला वही सिस्टम है, जो इसे बनाता है। इसलिए प्लान के क्रियान्वयन की हर तिमाही सार्वजनिक ऑडिट हो और उसे वेबसाइट पर डाला जाए। एक एकड़ वाले नियम को हटाकर छोटे भू-धारकों के लिए क्लस्टर डेवलपमेंट का विकल्प दिया जाए, ताकि वे मिलकर विकास कर सकें। स्मार्ट सिटी के बिजली के खंभों जैसे बुनियादी सुरक्षा ऑडिट को मास्टर प्लान का हिस्सा बनाया जाए और हर वार्ड में सेफ्टी सर्टिफिकेट अनिवार्य किया जाए। तालाबों के कैचमेंट में किसी भी निर्माण को अनुमति देने से पहले पर्यावरणीय ऑडिट हो और उसकी जिम्मेदारी किसी एक अफसर की तय हो। झुग्गी पुनर्वास को सिर्फ मकान देना न समझा जाए, बल्कि रोजगार और शिक्षा से जोड़ा जाए। तभी झुग्गी व्यवसाय बंद होगा।
उम्मीद और यथार्थ के बीच भोपाल
सिस्टम सतत होता है, लेकिन कुर्सी पर बैठा हर खिलाड़ी कुछ समय बाद चला जाता है। तब उसे अपनी भूल समझ आती है। अनुभव बहुत आशा नहीं जगाते, लेकिन निराशा में भी जिया नहीं जा सकता। नया ड्राफ्ट आया है, यह अच्छी बात है। दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया चल रही है। अंतिम प्रकाशन कोर्ट के आदेश के बाद होगा, लेकिन असली परीक्षा प्रकाशन के बाद शुरू होगी। क्या यह प्लान जमीन पर उतरेगा या फिर फाइलों में ही स्मार्ट दिखता रहेगा? यह सवाल सिर्फ प्लानर्स का नहीं, बल्कि भोपाल के हर नागरिक का है।














