लखनऊ, 02 अक्टूबर।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक बिसात अभी पूरी तरह बिछी भी नहीं है, लेकिन दलित वोटों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। 403 सदस्यीय विधानसभा में 84 सीटें अनुसूचित जाति और 2 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। यानी कुल 86 आरक्षित सीटें विधानसभा का करीब 21 प्रतिशत हिस्सा हैं। सरकार बनाने के लिए 202 सीटों की जरूरत होती है, इसलिए इन सीटों पर प्रदर्शन चुनावी गणित में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दरअसल, पिछले विधानसभा चुनावों में भी आरक्षित सीटों ने सत्ता के समीकरण बदले हैं।
इतिहास गवाह है कि जब दलित वोट बदलता है तो सत्ता के समीकरण भी बदलते हैं। उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनावों का इतिहास बताता है कि आरक्षित सीटों का प्रदर्शन व्यापक राजनीतिक तस्वीर से अलग नहीं रहा है। 2017 में भाजपा ने 86 आरक्षित सीटों में 70 पर जीत दर्ज की थी। उसके सहयोगियों ने भी कुछ सीटें जीतीं, जिससे भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन का आंकड़ा और बढ़ गया। 2022 में भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन ने 65 आरक्षित सीटें जीतीं, जबकि समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन के खाते में 20 सीटें आईं। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने तस्वीर में एक नया संकेत दिया। उत्तर प्रदेश की 17 अनुसूचित जाति आरक्षित लोकसभा सीटों में भाजपा को केवल आठ सीटें मिलीं। ऐसे में 2027 में भाजपा के सामने आरक्षित सीटों पर अपना पिछला प्रदर्शन बनाए रखने और दलित समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संगठनात्मक पहुंच मजबूत करने की चुनौती रहेगी।
इस राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में बहुजन समाज पार्टी की भूमिका भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती। 2024 में बसपा लोकसभा में उत्तर प्रदेश से कोई सीट नहीं जीत सकी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दलित समाज में उसका प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो गया है। दलित वोट एकसमान राजनीतिक समूह नहीं है और अलग-अलग उपसमुदायों के राजनीतिक रुझान अलग हो सकते हैं।
समाजवादी पार्टी ने 2027 के लिए दलित प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में अपनी रणनीति को आगे बढ़ाया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी करीब 100 एससी-एसटी उम्मीदवार उतारने की योजना पर काम कर रही है, जिसमें आरक्षित सीटों के अलावा 14 सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवार उतारने का विचार शामिल है। यह कदम पार्टी के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ को विस्तार देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सपा के लिए चुनौती केवल टिकट देने तक सीमित नहीं है। उसे दलित समाज के विभिन्न समूहों के बीच राजनीतिक भरोसा बनाने और अपने संगठन में उनकी भागीदारी बढ़ाने की जरूरत होगी।
यहां सवाल सिर्फ 86 सीटों का नहीं है। 2027 की लड़ाई को केवल आरक्षित सीटों के आंकड़े से समझना अधूरा होगा। असली प्रश्न यह होगा कि दलित मतदाता का कितना हिस्सा किस दल के साथ जाता है और क्या समर्थन कितनी सामान्य तथा आरक्षित सीटों पर जीत में बदलता है। इसके अलावा स्थानीय उम्मीदवार, गठबंधन, क्षेत्रीय मुद्दे और सरकार के कामकाज का मूल्यांकन भी मतदान के फैसले को प्रभावित करते हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता अब केवल किसी एक दल का बंधुआ नहीं रहा। वह यह भी देखता है कि शिक्षा, नौकरी, सुरक्षा, सम्मान और राजनीतिक भागीदारी में उसका हिस्सा कहां है। जो दल इन सवालों का ठोस जवाब देगा, वह इस बड़े वोट बैंक के करीब पहुंचेगा।
उत्तर प्रदेश में दलित वोटों की नई सियासी जंग सिर्फ आंकड़ों की जंग नहीं है, यह भरोसे की जंग है। भाजपा ने पिछले दो चुनावों में आरक्षित सीटों पर बड़ी जीत हासिल की, लेकिन लोकसभा 2024 के नतीजों ने संकेत दिया कि जमीन पर नाराजगी भी है। समाजवादी पार्टी पीडीए के जरिए नई जमीन तैयार करने की कोशिश में है, तो बसपा अपने पुराने जनाधार को फिर से खड़ा करने की जद्दोजहद में है। ऐसे में 2027 का चुनाव यह तय करेगा कि दलित समाज किसे अपना स्वाभाविक मित्र मानता है और किसे केवल चुनावी मौसम का साथी। आने वाले महीनों में हर दल को यह साबित करना होगा कि वह सिर्फ वोट नहीं, बल्कि हिस्सेदारी और सम्मान देने को तैयार है।














