नई दिल्ली, 02 अक्टूबर।
आज प्राइमरी केयर में एआई एक भरोसेमंद जूनियर की तरह काम कर रहा है। एंटीबायोटिक चुनने, ब्लड रिपोर्ट का मतलब समझने और चक्कर जैसी उलझी शिकायत की जड़ पकड़ने में वह मदद कर रहा है। ओपनएविडेंस जैसे प्लेटफॉर्म गाइडलाइन और रिसर्च पेपर पढ़कर तुरंत जवाब दे रहे हैं। सीनियर डॉक्टरों के लिए यह वरदान है, लेकिन जूनियर डॉक्टरों के लिए यही वरदान धीरे-धीरे अभिशाप बन सकता है, क्योंकि जो काम दिमाग को करना था, वह अब ऐप कर रहा है।
नई पीढ़ी के डॉक्टरों में बदलाव दिख रहा है। पहले छात्र दवाओं के नाम, डोज और साइड इफेक्ट याद करते थे। अब सब क्लाउड में है। स्मार्टफोन कहता है कि याद क्यों करना, जब सर्च कर सकते हो। जब बहुत जल्दी बहुत ज्यादा मदद मिल जाती है तो सीखने की क्षमता कमजोर पड़ सकती है। मेडिकल शिक्षा में रटना बुरा शब्द माना जाता है, लेकिन बिना याद किए समझ भी विकसित नहीं होती।
अनुभवी डॉक्टर एआई के जवाब को सवालों की नजर से देखता है। वह अपने अनुभव से पूछता है कि क्या यह जवाब इस मरीज पर लागू होगा। ट्रेनी के पास यह फिल्टर नहीं होता। वह एआई को गुरु मानकर कॉपी-पेस्ट कर सकता है। इससे उसकी क्लीनिकल समझ विकसित होने में बाधा आ सकती है।
पहले छात्र मरीज के पास बैठता था, उसकी आंखें देखता था और उसकी सांस गिनता था। अब वह स्क्रीन पर रिपोर्ट देखता है और एआई से पूछता है कि क्या करें। एआई ब्लड रिपोर्ट पढ़ सकता है, लेकिन मरीज के चेहरे पर छिपा डर नहीं पढ़ सकता। वह दवा बता सकता है, लेकिन भरोसा नहीं दे सकता।
एआई को बैन करना समाधान नहीं है। सवाल संतुलन का है। छात्र पहले अपने दिमाग से निदान लिखें और फिर एआई से मिलान करें। परीक्षा में सही उत्तर के साथ सोचने की प्रक्रिया को भी महत्व मिले। भविष्य का डॉक्टर ऐसा होना चाहिए जो एआई के बिना भी काबिल हो और एआई के साथ और ज्यादा काबिल बन जाए। तकनीक को स्टीयरिंग नहीं, पावर स्टीयरिंग बनाना होगा। गाड़ी डॉक्टर को ही चलानी है।













