छिंदवाड़ा, 02 अक्टूबर।
छिंदवाड़ा में कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत ने पूरे प्रदेश को हिला दिया था, लेकिन उस हादसे के बाद भी व्यवस्था की नींद नहीं टूटी है। आज भी मध्य प्रदेश की प्रयोगशालाओं में छह हजार से ज्यादा दवाओं के नमूने जांच का इंतजार कर रहे हैं। कागज पर नियम कहता है कि सैंपल लेने से लेकर रिपोर्ट आने तक का समय 50 दिन है, लेकिन जमीन पर यही काम महीनों तक लटका रहता है। सोचिए, जिस दवा को मरीज अपनी जान बचाने के लिए खा रहा है, उसी की गुणवत्ता पर ही सवाल हो तो स्वास्थ्य व्यवस्था का क्या मतलब रह जाता है? यह सिर्फ एक तकनीकी देरी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ है।
पचास दिन का वादा और छह महीने का इंतजार क्यों
सरकारी व्यवस्था में दवा की जांच दो स्तरों पर होती है। एक तो सरकारी खरीद की दवाएं और दूसरी बाजार में बिक रही दवाएं। औषधि निरीक्षक दुकानों से नमूने लेते हैं और उन्हें लैब भेजते हैं, लेकिन लैब में स्टाफ कम है, मशीनें पुरानी हैं और सैंपल ज्यादा हैं। नतीजा यह होता है कि जांच रिपोर्ट आने तक वह दवा आधी बाजार में बिक चुकी होती है। अगर रिपोर्ट में दवा फेल भी हो जाए तो तब तक सैकड़ों लोग उसे खा चुके होते हैं। यह कैसी व्यवस्था है, जहां सजा बाद में मिलती है और जहर पहले बिक जाता है? जब तक रिपोर्ट आएगी, तब तक नया बैच बाजार में आ जाता है और पुराना बैच लोगों के खून में घुल चुका होता है।
तीन लैब, पचहत्तर अफसर और पचास हजार दुकानें
पूरे मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में दवा जांच के लिए सिर्फ तीन लैब हैं, भोपाल, इंदौर और जबलपुर, और इनमें भी पूरी तरह सक्रिय सिर्फ भोपाल की लैब है। पूरे प्रदेश में करीब 75 ड्रग इंस्पेक्टर कार्यरत हैं और मेडिकल स्टोर की संख्या 50 हजार से ज्यादा है। एक इंस्पेक्टर के जिम्मे सैकड़ों दुकानें हैं। वह कैसे हर दुकान पर नजर रखेगा, कैसे हर संदिग्ध दवा का नमूना लेगा? यह गणित ही गलत है। अकेले भोपाल में साढ़े तीन हजार से ज्यादा मेडिकल स्टोर हैं और जांच की गति इतनी धीमी है कि साल भर में छह हजार से 6,500 नमूनों की ही जांच हो पाती है, जबकि प्रदेश में हर साल 10 हजार करोड़ से ज्यादा का दवा कारोबार होता है। छह सौ करोड़ की दर से कारोबार बढ़ भी रहा है। ऐसे में छह हजार सैंपल तो समंदर में एक बूंद के बराबर हैं।
छिंदवाड़ा की चीख के बाद भी सिस्टम बहाना ढूंढ रहा
छिंदवाड़ा कांड के बाद लगा था कि सरकार जागेगी, सैंपलिंग तेज होगी और लैब की क्षमता बढ़ेगी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। फाइलों में बैठकें हुईं, निर्देश जारी हुए और फिर सब ठंडे बस्ते में चला गया। खाद्य एवं औषधि विभाग के अधिकारी खुद मानते हैं कि सैंपलिंग और जांच की गति धीमी है, लेकिन इस स्वीकृति से क्या होगा? जब तक लैब नहीं बढ़ेंगी, स्टाफ नहीं बढ़ेगा और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक कोई सुधार नहीं होगा। आज भी कई एजेंसियों के पास अभी तक एक भी जांच रिपोर्ट नहीं आई है, जिससे पता चल सके कि जो दवा वे बेच रहे हैं, वह असली है या नकली। यह स्थिति बताती है कि सिस्टम में पारदर्शिता नहीं, बल्कि पर्दादारी चल रही है।
जब बीमारी से ज्यादा खतरनाक हो जाए इलाज
आम आदमी क्या करे? वह डॉक्टर के पास जाता है, डॉक्टर पर्ची लिखता है, वह मेडिकल स्टोर से दवा लेता है और भरोसे के साथ खा लेता है। उसे क्या पता कि जो सिरप वह अपने बच्चे को पिला रहा है, उसकी जांच हुई भी है या नहीं? यह भरोसा ही तो स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव है और यही नींव आज हिल रही है। अगर दवा ही जहरीली होगी तो डॉक्टर क्या करेगा, अस्पताल क्या करेगा? यह तो ऐसा ही है जैसे रोटी में ही जहर मिला हो। सरकारी सप्लाई की दवाओं की जांच की बात तो फिर भी होती है, लेकिन प्राइवेट बाजार में बिकने वाली हजारों कंपनियों की दवाओं का क्या, जो हर गली में बिना किसी रोक-टोक के बिक रही हैं?
भरोसे को लौटाने के लिए क्या करना होगा
अब जरूरत है कि दवा जांच को एक मिशन के तौर पर लिया जाए। हर संभाग में एक आधुनिक लैब बनाई जाए। मोबाइल टेस्टिंग वैन हर जिले में घूमें और औचक नमूने लें। सैंपल की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन हो। हर सैंपल का क्यूआर कोड हो, ताकि कोई भी नागरिक देख सके कि उसके शहर की दवा की जांच कहां अटकी है। जो कंपनी बार-बार फेल हो, उसका लाइसेंस हमेशा के लिए खत्म किया जाए और उसके मालिकों पर हत्या की कोशिश का मामला दर्ज हो। साथ ही ड्रग इंस्पेक्टरों की संख्या कम से कम तीन गुनी की जाए और उन्हें राजनीतिक दबाव से मुक्त किया जाए। जब तक जांच रिपोर्ट को दुकान पर चस्पा करना अनिवार्य नहीं होगा, तब तक दुकानदार भी नकली दवा बेचने से डरेंगे नहीं।
सवाल सिस्टम से नहीं, खुद से भी
छिंदवाड़ा में जिन बच्चों की जान गई, क्या उनकी कोई कीमत नहीं थी? क्या अगली बारी हमारे घर की है? यह सोचना डरावना है, लेकिन सच है। दवा जीवन देती है और अगर वही दवा बिना जांच के बाजार में बिकेगी तो वह जीवन लेगी भी। इसलिए जरूरी है कि हम भी जागरूक बनें। दवा लेते समय बिल लें, बैच नंबर देखें और यदि किसी दवा से रिएक्शन हो तो उसकी शिकायत करें। तभी यह व्यवस्था सुधरेगी और तभी भरोसा लौटेगा।














