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संपादकीय
03 Oct, 2026

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश, बयान नहीं जवाबदेही चाहिए, दिल्ली एनसीआर में बढ़ते यौन अपराध पर संज्ञान

दिल्ली एनसीआर में बढ़ते यौन अपराधों पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर केंद्र, दिल्ली सरकार और पुलिस से सुरक्षा उपायों व प्रशासनिक जवाबदेही पर जवाब मांगा है।

दिल्ली एनसीआर, 03 अक्टूबर।

दिल्ली एनसीआर में यौन अपराधों की बढ़ती घटनाओं ने अब सर्वोच्च न्यायालय को भी चिंतित कर दिया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर विषय पर स्वतः संज्ञान लिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट कहा, केवल नेताओं और अफसरों के बयान काफी नहीं हैं। अब जवाबदेही तय होनी चाहिए। पीठ ने कहा कि अपराधों की रोकथाम में प्रशासनिक और कानून व्यवस्था से जुड़ी जो खामियां हैं, उनकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

देश भर में हर रोज 81 मामले, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के नवीनतम आंकड़े डराने वाले हैं। वर्ष 2024 में देश भर में बलात्कार के 29,536 मामले दर्ज हुए हैं, यानी हर दिन औसतन 81 मामले। यह आंकड़ा बताता है कि स्थिति कितनी भयावह है। 70 साल से कम उम्र में हृदय रोग से होने वाली मौतों में एक तिहाई मौतें समय से पहले हो रही हैं और उसके बड़े कारणों में तंबाकू, हाई बीपी, शुगर, मोटापा, निष्क्रिय जीवनशैली, खराब खानपान और वायु प्रदूषण हैं। लेकिन यौन अपराधों का ग्राफ भी उसी गति से बढ़ रहा है।

दिल्ली पुलिस में दर्ज मामलों का आंकड़ा भी चिंताजनक है। वर्ष 2021 में 2,076 मामले दर्ज हुए। वर्ष 2022 में 2,043 मामले दर्ज हुए। वर्ष 2023 में 2,141 मामले दर्ज हुए। वर्ष 2024 में 2,076 मामले दर्ज हुए। वर्ष 2025 में अब तक 1,901 मामले दर्ज हो चुके हैं। इनमें बलात्कार, गैंगरेप और यौन उत्पीड़न के मामले शामिल हैं। 2 से 21 सितंबर तक गुरुग्राम, गाजियाबाद सहित दिल्ली एनसीआर में यौन अपराध की 12 घटनाएं दर्ज हुई हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान दो हालिया घटनाओं का विशेष जिक्र किया। मामला 4 अगस्त का है। ग्रेटर नोएडा में एक स्लीपर बस में सवार 17 वर्षीय लड़की के साथ कंडक्टर और ड्राइवर ने गैंगरेप किया और फिर उसे 40 किलोमीटर से अधिक दूर पुरानी दिल्ली के कश्मीरी गेट के पास छोड़ दिया। दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। बस ग्रेटर नोएडा से दिल्ली करीब 47 किलोमीटर चली और पुलिस ने उसे रास्ते में नहीं रोका। दूसरा मामला 21 सितंबर का है। पुलिसकर्मी बनकर आए तीन लोगों ने दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के एक इलाके में चाकू की नोंक पर 16 वर्षीय लड़की का रेप किया। पुलिस ने दो दिन बाद ही आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। उनमें से एक को तड़के हुई मुठभेड़ में पकड़ा गया था।

पीठ ने कहा कि ये दोनों मामले 2012 के निर्भया मामले से जुड़े हुए हैं और दोनों में दर्दनाक समानताएं हैं। पीठ ने सवाल उठाया कि इन 12 सालों में कानून और सार्वजनिक सुरक्षा में कितना सुधार हुआ है। कोरी चिंता से काम नहीं चलेगा। शीर्ष अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि अफसरों और निर्वाचित प्रतिनिधियों की ओर से कोरी चिंता जताना या पीड़ितों के प्रति एकजुटता के बयान देना काफी नहीं है। स्पष्ट जवाबदेही जरूरी है, जिससे अपराधों की रोकथाम, सार्वजनिक व्यवस्था और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय हो। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक चूक सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पार्क, बसें, मेट्रो स्टेशन, सबवे और फुटओवर ब्रिज पर अपर्याप्त रोशनी, निगरानी की कमी या गश्त की कमी जैसी रोकी जा सकने वाली प्रशासनिक खामियों के कारण सार्वजनिक स्थान अधिक जोखिम भरे बन जाते हैं। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में गरिमा के साथ और हिंसा के भय से मुक्त जीवन का अधिकार भी शामिल है। पीठ ने कहा कि सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल अपराध के बाद कानूनी कार्रवाई करने तक सीमित नहीं है। अदालत ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है। अदालत ने पूछा है, सार्वजनिक सुरक्षा को बेहतर करने के लिए मौजूदा उपाय कितने प्रभावी हैं? अदालत ने यह भी पूछा है कि क्या मौजूदा एसओपी का पालन हो रहा है। अगली सुनवाई में सभी पक्षों को जवाब देना होगा।

यह फैसला एक नजीर बन सकता है। अब तक हर बड़ी घटना के बाद बयान आते थे और मामला ठंडा पड़ जाता था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार कहा है कि बयान नहीं, सिस्टम में सुधार चाहिए। जवाबदेही तय होगी तो अधिकारी सजग होंगे और सड़कों पर गश्त बढ़ेगी, सीसीटीवी काम करेंगे और बसों में सुरक्षा जांच होगी। दिल्ली एनसीआर देश की राजधानी है और यहां सुरक्षा सबसे अहम है। जब यहां हर दिन यौन अपराध हो रहे हैं तो देश के बाकी हिस्सों का अंदाजा लगाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह स्वतः संज्ञान उम्मीद जगाता है कि अब केवल निंदा नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई होगी। जवाबदेही तय होने से ही बेटियां सुरक्षित होंगी।

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