भोपाल, 03 अक्टूबर।
भोपाल की अरेरा कॉलोनी कभी नेताओं, उद्योगपतियों, अफसरों की शांत बस्ती कहलाती थी। अब वहां 4,500 घरों में दुकानें चल रही हैं। डॉक्टर का क्लीनिक, वकील का ऑफिस, बुटीक, कैफे और कोचिंग सेंटर, सब घरों में घुस चुके हैं। अब नए मास्टर प्लान ड्राफ्ट 2047 में इस सच्चाई को नियम का नाम दिया जा रहा है। प्रति वर्गफीट 1,556 रुपए की दर से फीस तय हो रही है। बड़े शोरूम के लिए यह रकम 70 लाख तक जा रही है। जो कारोबार कर रहे हैं, वे अभी से हिसाब लगा रहे हैं, ताकि प्लान लागू होते ही पैसा भरकर वैध हो जाएं।
बारह मीटर की गली में अस्पताल का सपना
नए ड्राफ्ट में सड़क की चौड़ाई से व्यवसाय तय किया गया है। 12 मीटर से कम चौड़ी सड़क पर एक मंजिल पर डॉक्टर, वकील, इंजीनियर को बैठने की अनुमति, 12 से 18 मीटर पर बैंक, मेडिकल स्टोर और डे केयर सेंटर, 18 से 24 मीटर पर नर्सिंग होम, होटल, रेस्टोरेंट और कोचिंग, 24 से 30 मीटर पर सर्विस सेंटर और सारी मिश्रित गतिविधियां। सोचिए, जिस गली में दो कारें एक साथ नहीं निकल सकतीं, वहां डे केयर और बैंक कैसे चलेंगे? पार्किंग कहां होगी? मरीज की एंबुलेंस कहां खड़ी होगी? यह योजना कागज पर तो व्यवस्थित लगती है, जमीन पर जाम ही जाम लाएगी।
ग्रीन बेल्ट में भी दुकान का जुगाड़
सबसे खतरनाक बात यह है कि ग्रीन बेल्ट और प्रतिबंधित क्षेत्र के आंतरिक संकरे मार्ग पर भी व्यवसाय को नियमित करने का रास्ता खोला जा रहा है। भोपाल की पहचान तालाब और हरियाली है। यदि हरियाली की जमीन पर भी दुकान वैध हो गई तो शहर सांस कहां लेगा? यह तो पर्यावरण पर सीधा हमला है। जो परिसर खुद को घर बताकर बने थे, अब वही शोरूम बन गए हैं और अब उन्हीं को वैध करने के लिए मास्टर प्लान का सहारा लिया जा रहा है।
सत्तर लाख का खेल
छोटे व्यापारी के लिए नहीं, 1,556 रुपए प्रति वर्गफीट की दर से छोटा व्यापारी वैध नहीं हो पाएगा। यह दर तो बड़े इन्वेस्टर के लिए है, जो करोड़ों का शोरूम चला रहा है। छोटा बुटीक या छोटी क्लीनिक वाला इतनी फीस नहीं भर पाएगा। नतीजा यह होगा कि बड़े लोग वैध हो जाएंगे, छोटे लोग अवैध ही रहेंगे और फिर अगली बार फिर से नियमितीकरण की योजना आएगी। यह एक अंतहीन चक्र है, जो अवैध निर्माण को बढ़ावा देता है।
मास्टर प्लान का काम शहर को सुव्यवस्थित करना था, न कि अवैध को पैसे लेकर वैध करना। यदि हर आवासीय कॉलोनी में 70 लाख देकर दुकान खुल जाएगी तो आवासीय शब्द का अर्थ ही खत्म हो जाएगा। जरूरत है कि व्यवसाय को सिर्फ बड़े कॉरिडोर पर अनुमति दी जाए, संकरी गलियों को आवासीय ही रखा जाए और ग्रीन बेल्ट को पूरी तरह व्यवसाय से मुक्त रखा जाए। अन्यथा भोपाल बिना प्लान के तो बेतरतीब बसा ही था, अब प्लान के साथ भी बेतरतीब ही बसेगा और आम नागरिक ट्रैफिक, पार्किंग और प्रदूषण में फंसा रहेगा।














