भोपाल, 03 अक्टूबर।
भाजपा के कोरग्रुप का मंथन महज एक बैठक नहीं, बल्कि 2028 के लिए चेतावनी का संकेत है। पार्टी ने उन 66 सीटों को केंद्र में रखा है, जहां वह या तो हारी है या बहुत कम अंतर से जीती है। यह आंकड़ा बताता है कि सत्ता में रहते हुए भी संगठन के भीतर असुरक्षा का भाव है। जो दल 20 वर्षों से सत्ता में है, वह यदि हारी हुई सीटों पर फिर लौटता है तो इसका अर्थ है कि वह जमीनी पकड़ ढीली होने को स्वीकार कर रहा है। कम अंतर से जीत का डर बड़ी हार से बड़ा होता है।
राजनीति में कम अंतर से जीती सीटें हारी हुई सीटों से अधिक खतरनाक मानी जाती हैं। हारी हुई सीट पर कार्यकर्ता संघर्ष करता है, लेकिन कम अंतर से जीती सीट पर आत्मसंतोष आ जाता है। भाजपा की चिंता यही है कि पांच हजार या उससे कम अंतर से जीती सीटें अगली बार पलट सकती हैं। इसलिए वहां बूथ स्तर तक जीवंत संपर्क की बात हो रही है। यह स्वीकारोक्ति है कि बूथ अब कागज पर मजबूत है, जमीन पर नहीं।
इस मंथन में मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्री और संगठन महामंत्री एक साथ बैठे। सत्ता जब लंबी चलती है तो संगठन पीछे छूट जाता है। विधायक और मंत्री अपने क्षेत्र में स्वतंत्र सत्ता बन जाते हैं और कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस करता है। कार्यकर्ताओं से दूर रहने वाले नेताओं को जिम्मेदारी न देने का संदेश इसी खिंचाव को पाटने की कोशिश है। कम बोलने और बयानबाजी से बचने का निर्देश भी इसी चिंता को दर्शाता है।
कोरग्रुप में 20 से अधिक विषयों पर चर्चा हुई। निकाय चुनाव, पंचायत चुनाव, प्रशासनिक समन्वय और बूथ प्रबंधन का विस्तार बताता है कि पार्टी कई मोर्चों पर तैयारी कर रही है। 2027 के निकाय चुनाव को 2028 का सेमीफाइनल मानना इसी रणनीति का हिस्सा है।
हारी सीटों पर लौटने का अर्थ है कि पार्टी को नए सामाजिक समीकरण की जरूरत महसूस हो रही है। इस मंथन का अमृत तभी निकलेगा, जब सत्ता अहंकार से बाहर निकले और कार्यकर्ता को नीति निर्माण में भागीदार बनाए। राजनीति में हार को याद रखना जीत से अधिक महत्वपूर्ण होता है।













