नई दिल्ली, 03 अक्टूबर।
पिछले चार बरसों में भारतीय लोकतंत्र ने एक अजीब तमाशा देखा है। 111 सांसद और विधायक अपने दल का दामन छोड़कर दूसरा दामन थाम चुके हैं। इनमें 26 लोकसभा सांसद और 78 विधानसभा सदस्य शामिल हैं। और तो और, लाखों कार्यकर्ता भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। वे भी झंडा बदलने में महारत हासिल कर चुके हैं। ऊपर से देखने पर यह सिर्फ एक राजनीतिक घटना लगती है, लेकिन भीतर झांकने पर यह लोकतंत्र की आत्मा पर चोट है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि दल क्यों बदला गया, सवाल यह भी है कि क्या दिल भी बदला गया? आंकड़ों की जुबानी सत्ता का चुंबक कितना ताकतवर है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच ने मिलकर एक रिपोर्ट जारी की है। उस रिपोर्ट की मानें तो सबसे ज्यादा पलायन एनपीएफ से हुआ है। 32 नेता वहां से निकले। 29 नेता भाजपा में शामिल हुए, 20 नेता एनपीपी के थे, नौ नेता कांग्रेस के थे, आठ नेता शिवसेना शिंदे गुट के थे और बाकी छोटे दलों के थे। यह आंकड़ा साफ बताता है कि जिधर सत्ता का सूरज चमक रहा है, उधर ही सब जा रहे हैं। विचारधारा का सूरज तो कब का डूब चुका है। अब तो सिर्फ सत्ता की रोशनी में ही सबको अपना भविष्य दिखता है।
भाजपा का आंगन सबसे बड़ा क्यों लगता है? इस पूरी भागदौड़ में सबसे ज्यादा जनप्रतिनिधि भाजपा को मिले हैं। 29 जनप्रतिनिधियों में सात राज्यसभा सांसद और 22 विधायक हैं। रिपोर्ट कहती है कि लोकसभा का कोई सांसद अपनी मूल पार्टी छोड़कर भाजपा में नहीं गया, क्योंकि लोकसभा में तो पहले से ही भाजपा का दबदबा है। राज्यसभा के सातों सांसद पहले आम आदमी पार्टी के टिकट पर आए थे और अब वे खास होकर भाजपा में आ गए हैं। गोवा के आठ कांग्रेस विधायक, गुजरात के चार, हिमाचल के दो और मणिपुर के पांच जेडीयू विधायक भी इसी कतार में हैं। दूसरी तरफ, जिन पार्टियों से लोग भागे हैं, उनमें एनडीपीपी के 25, टीएमसी के 20 और कांग्रेस के 19 नेता हैं। यानी जहां सत्ता की नाव डूब रही है, वहां से सब कूद रहे हैं।
नागालैंड से बंगाल तक एक ही कहानी का अलग मंचन। नागालैंड में 31 विधायकों ने कहा कि हमने दल नहीं बदला, हमने विलय किया है और विधानसभा अध्यक्ष ने भी उनकी बात मान ली। यह विलय का खेल तो ऐसा है जैसे कोई कहे कि मैंने घर नहीं बदला, बस नाम बदल दिया है। बंगाल में 20 मामले, तेलंगाना में नौ, गोवा और पंजाब में आठ-आठ मामले सामने आए हैं। इससे पता चलता है कि दल बदल की बीमारी किसी एक राज्य की नहीं, बल्कि पूरे देश की है। हर जगह स्क्रिप्ट वही है, बस कलाकार बदल जाते हैं।
व्यंग्य के पीछे छिपा गंभीर सवाल, क्या आत्मा भी बिकती है? कल तक जो नेता एक पार्टी के मंच से दूसरी पार्टी को कोस रहा था, आज उसी पार्टी के मंच से उसकी तारीफ कर रहा है। कल तक जो नेता धर्मनिरपेक्षता की दुहाई दे रहा था, आज वह दूसरी ही भाषा बोल रहा है। कुर्ता वही है, टोपी वही है, चेहरा वही है, बस गमछा बदल गया है। इससे बड़ा व्यंग्य और क्या होगा कि जनता जिसे अपना प्रतिनिधि समझती है, वह प्रतिनिधि ही अपना अस्तित्व बदल लेता है। लेकिन इस व्यंग्य के पीछे एक गंभीर संदेश भी है कि जब नेता ही स्थिर नहीं रहेगा तो जनता का भरोसा कैसे स्थिर रहेगा?
जनादेश का अपमान और मतदाता का मौन आक्रोश। लोकतंत्र में जनता वोट देकर अपना फैसला सुनाती है। वह किसी दल को उसके वादों और विचारों के आधार पर चुनती है। जब उसी दल का नेता जीतने के बाद दूसरे दल में चला जाता है तो यह सिर्फ दल बदल नहीं, बल्कि जनादेश का अपमान है। जनता ने एक निशान पर बटन दबाया था, लेकिन नेता दूसरे निशान पर चला गया। इससे मतदाता के मन में एक मौन आक्रोश पैदा होता है। वह सोचता है कि मेरे वोट की कीमत क्या है? क्या मेरा वोट सिर्फ सत्ता की मंडी में बिकने के लिए है?
कानून की आंखों पर पट्टी और अध्यक्ष की भूमिका पर प्रश्न। दल बदल विरोधी कानून बना तो है, लेकिन उसकी आंखों पर पट्टी बंधी है। दो तिहाई विधायकों के साथ विलय का प्रावधान इस कानून का सबसे बड़ा छेद है। नेता इसी छेद से निकल जाते हैं और कहते हैं कि यह दल बदल नहीं, विलय है। विधानसभा अध्यक्ष, जो खुद किसी दल से आता है, वह भी अपने दल के हित में फैसला देता है। मामला सालों तक अदालत में लटका रहता है और जब तक फैसला आता है, तब तक अगला चुनाव आ जाता है और जनता सब भूल जाती है। इसलिए इस कानून को और सख्त और निष्पक्ष बनाने की जरूरत है।
दिल बदलने की असली परीक्षा अभी बाकी है। दिल नहीं, दल बदले, यह बात सौ प्रतिशत सच है। दल तो बदल लिए, लेकिन दिल वहीं अटका है, जहां पहले था। अगर दिल सच में बदलता तो भाषा बदलती, सोच बदलती और काम करने का तरीका बदलता, लेकिन यहां तो सिर्फ मंच बदलता है, विचार वही रहते हैं। इसीलिए जनता को चाहिए कि वह सिर्फ झंडा न देखे, बल्कि दिल भी देखे। अगली बार जब कोई नेता आपके दरवाजे पर वोट मांगने आए तो उससे पूछिए कि आपने पिछली बार किस दल से चुनाव लड़ा था और अब किस दल से आए हैं। अगर उसका जवाब संतोषजनक न हो तो उसे वहीं रोक दीजिए। तभी यह आयाराम-गयाराम की संस्कृति रुकेगी और लोकतंत्र फिर से मजबूत होगा।














