भोपाल, 03 अक्टूबर।
भाषा सिर्फ शब्द नहीं, संस्कृति की आत्मा है। आज हर हाथ में मोबाइल है और हर मोबाइल में एआई है। वह झट से एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद कर देता है। अंग्रेजी से हिंदी, हिंदी से बुंदेलखंडी, बुंदेलखंडी से गोंडी, सब कुछ पल भर में हो जाता है। लगता है जैसे दुनिया कितनी छोटी हो गई है, लेकिन इस छोटी होती दुनिया में एक बड़ा डर भी छिपा है कि कहीं इस तेज रफ्तार में हमारी अपनी भाषाएं और बोलियां पीछे न छूट जाएं। भाषा सिर्फ बातचीत का जरिया नहीं है, वह हमारे त्योहारों, परंपराओं, किस्सों, गीतों और लोक कलाओं को अपने अंदर समेटे रहती है। जब एक भाषा मरती है तो सिर्फ कुछ शब्द नहीं मरते, बल्कि एक पूरी दुनिया मर जाती है। अनुवाद मशीन का है, इंसान का नहीं। एआई अनुवाद करता है, लेकिन समझता नहीं है। वह शब्द को शब्द से बदल देता है, लेकिन भाव को भाव से नहीं जोड़ पाता। हमारे यहां कहा जाता है, सावन के झूले में मल्हार है, तो एआई उसका शाब्दिक अनुवाद कर देगा, लेकिन उस मल्हार में जो नमी है, जो मिट्टी की खुशबू है, जो मां के आंचल की याद है, वह कहां से लाएगा? बुंदेलखंड में जब कोई कहता है कि लाला, तुम तो बौरे हो गए हो, तो उसमें प्यार है, डांट नहीं है। एआई इसे अपमान समझ लेगा। मालवा में जब होली पर फाग गाई जाती है तो उसके सुर में जो मस्ती है, वह किसी डेटा में नहीं मिलती। इसलिए यह सोचना कि एआई हमारी भाषाओं को बचा लेगा, एक भ्रम है। वह तो सिर्फ एक यंत्र है, जो हमारे ज्ञान पर पल रहा है।
एआई को चलाने के लिए डेटा चाहिए और डेटा चाहिए तो अंग्रेजी चाहिए, क्योंकि इंटरनेट का नब्बे प्रतिशत से ज्यादा डेटा अंग्रेजी में है। हिंदी का डेटा भी बहुत कम है और बुंदेली, निमाड़ी, बघेली, भीली, गोंडी का डेटा तो न के बराबर है। ऐसे में एआई पहले अंग्रेजी सीखेगा, फिर हिंदी, और हमारी बोलियां तो उसकी प्राथमिकता में ही नहीं हैं। इसका मतलब साफ है कि जो भाषा डेटा नहीं देगी, वह एआई की दुनिया में दिखेगी ही नहीं। धीरे-धीरे हमारी नई पीढ़ी सोचेगी कि इन बोलियों में तो कुछ है ही नहीं और वह इन्हें छोड़ देगी। यह एक तरह का डिजिटल उपनिवेशवाद है, जहां पहले हमारी जमीन पर कब्जा होता था, अब हमारी जुबान पर कब्जा हो रहा है।
भगोरिया हाट में जब भील युवा अपनी बोली में गीत गाता है तो एआई उसका अनुवाद कैसे करेगा? उस गीत में फसल की बात है, प्रेम की बात है, जंगल की बात है, वह सब एक साथ है। क्या एआई उस लय को पकड़ पाएगा? नहीं पकड़ पाएगा। इसी तरह गणगौर पर मालवा की महिलाएं जो गीत गाती हैं, उनमें जो विरह है, वह किसी ट्रांसलेशन मॉडल में नहीं है। हमारे कुम्हार की चाक पर जो कहानी घूमती है, हमारे बुनकर के करघे पर जो लोककथा बुनी जाती है, वह सब हमारी बोली में ही जिंदा है। बोली गई तो कला भी गई और कला गई तो पहचान भी गई।
आत्मनिर्भरता का मतलब क्या है? इसका मतलब यह नहीं है कि हम एआई का विरोध करें। विरोध करना मूर्खता होगी। एआई एक ताकत है, लेकिन हमें उसके मालिक बनना है, उसके गुलाम नहीं। आत्मनिर्भरता का मतलब है कि हम अपनी भाषाओं का डेटा खुद बनाएं। हमारे स्कूलों में बच्चों को अपनी बोली में कहानी लिखने को कहा जाए। हमारे विश्वविद्यालयों में लोकगीतों को रिकॉर्ड किया जाए। हमारे युवा अपनी बोली में यूट्यूब चैनल, पॉडकास्ट और ऐप बनाएं। सरकार सिर्फ हिंदी दिवस न मनाए, बल्कि बोली दिवस भी मनाए। जब हमारे पास अपना डेटा होगा तो हम एआई को अपनी शर्तों पर सिखा पाएंगे कि देखो, यह हमारी भाषा है, ऐसे बोली जाती है, इसमें इतना प्यार है।
घर में अपनी बोली बोलें, बच्चों से उसी में बात करें। त्योहारों को सिर्फ फोटो खिंचवाने का मौका न समझें, बल्कि उनके पीछे की कथा को अपनी भाषा में सुनें और सुनाएं। स्थानीय कलाकारों को पैसा और मंच दोनों दें। जब एक गोंडी चित्रकार को लगेगा कि उसकी कला बिक रही है तो वह अपनी भाषा भी बचाएगा। तकनीक में अपनी भाषा को डालें, कीबोर्ड बनाएं, शब्दकोश बनाएं, वाक्यों का संग्रह बनाएं। तभी एआई हमारी भाषा सीखेगा और हमें उसकी बैसाखी की जरूरत नहीं पड़ेगी। एआई बहुत तेज है, लेकिन संस्कृति तेज नहीं होती। वह धीरे-धीरे पनपती है, जैसे बरगद का पेड़। अगर हम बरगद को तेज बढ़ाने के लिए खींचेंगे तो वह टूट जाएगा। उसी तरह अगर हम अपनी भाषा, संस्कृति और परंपरा को बचाने के लिए पूरी तरह एआई पर निर्भर हो गए तो हम अपनी जड़ें ही खो देंगे। इसलिए जरूरी है कि हम तकनीक का उपयोग करें, लेकिन अपनी पहचान अपने हाथों में रखें। अपनी बोली को जिंदा रखना किसी मशीन का काम नहीं, बल्कि हम सबका कर्तव्य है।














