भोपाल, 03 अक्टूबर।
भोपाल में बुजुर्गों पर हमले की यह पहली लहर नहीं है। कुछ वर्ष पहले तक शहर में बुजुर्गों की हत्या की घटनाएं छिटपुट थीं, अब वे पैटर्न बनती दिख रही हैं। ताजा घटनाएं चीखकर कहती हैं कि खतरा बाहर नहीं, भीतर है। सूरज नगर में 70 वर्षीय रिटायर्ड आईएएस अधिकारी राकेश अग्रवाल की घर में गला रेतकर हत्या कर दी गई। 25 सितंबर को अवधपुरी में 71 वर्षीय रिटायर्ड खनन अधिकारी मोहन चौधरी पर घर में घुसकर हथौड़े से हमला किया गया और लूट की कोशिश की गई। पांच महीने पहले हबीबगंज में एक बुजुर्ग दंपती को किरायेदार और घरेलू सहायक ने मिलकर निशाना बनाया। इन घटनाओं में एक समानता है, हमलावर कोई अनजान नहीं था। वह वही था जिसे घर में प्रवेश और भरोसा मिला था।
पुलिस के बहीखाते में भरोसे की कमी वेरिफिकेशन के आंकड़ों में दिखती है। कोलार में दो महीने में 450, अशोका गार्डन में 115, गोविंदपुरा में दो महीने में 200, बागसेवनिया में छह महीने में 1,000, हबीबगंज में छह महीने में 500 से ज्यादा और टीटी नगर में किरायेदारों के 124 वेरिफिकेशन हुए, जबकि केयरटेकर का सिर्फ एक आवेदन हुआ। यह आंकड़ा बताता है कि सत्यापन को लेकर अब भी गंभीर लापरवाही है। लोग सोचते हैं कि वेरिफिकेशन से पुलिस की पूछताछ होगी, किरायेदार नाराज होगा या घरेलू सहायक काम छोड़ देगा। यही छोटी सोच बड़े अपराध को जन्म देती है।
पहले संयुक्त परिवार थे, घर में चार आंखें हमेशा पहरा देती थीं। अब एकल परिवार हैं। बच्चे बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली में हैं, माता-पिता भोपाल में अकेले हैं। इसी अकेलेपन का फायदा अपराधी उठाता है। वह पहले भरोसा जीतता है, फिर घर की व्यवस्था और कमजोरियां समझता है और एक दिन लुटेरा बन जाता है। 2015 से 2020 के बीच मध्य प्रदेश में वरिष्ठ नागरिकों के खिलाफ अपराध में करीब 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी और 60 प्रतिशत वारदातों में आरोपी घर का जाना-पहचाना निकला था।
इस भरोसे के कत्ल को रोकने के लिए वेरिफिकेशन अनिवार्य और आसान बनाना होगा। किरायेदार और घरेलू सहायक का पुलिस सत्यापन ऑनलाइन हो तथा प्रमाणपत्र मकान मालिक को मिले। बिना जांच के केयरटेकर उपलब्ध कराने वाली एजेंसियों की जवाबदेही तय हो। मोहल्ला स्तर पर बुजुर्ग सुरक्षा समितियां बनें और अकेले रहने वाले बुजुर्गों का नियमित हालचाल लिया जाए। सीसीटीवी, पैनिक बटन और थाने से जुड़ा हेल्पलाइन नंबर सुरक्षा को मजबूत कर सकते हैं।
रातीबड़ पुलिस ने एजेंसी संचालक को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। जांच में सामने आया है कि आरोपी ने एजेंसी को जो पुलिस वेरिफिकेशन प्रमाणपत्र दिया था, वह 2025 में पटियाला नामा पुलिस ने जारी किया था। इसके बावजूद एजेंसी ने पुराने प्रमाणपत्र के आधार पर आरोपी को काम पर रखा और दोबारा वेरिफिकेशन नहीं कराया। यह लापरवाही गंभीर सवाल खड़े करती है।
बुजुर्ग घर की नींव हैं। हमने बच्चों को सीसीटीवी में सुरक्षित कर लिया, लेकिन माता-पिता को भरोसे के हवाले छोड़ दिया। यह कैसी तरक्की है, जहां बेटा बाहर है और हत्यारा भीतर है? वेरिफिकेशन कागज नहीं, जीवन रक्षा का पहला मंत्र है। हर नए चेहरे से पूछना होगा, आप कौन हैं और कहां से आए हैं, क्योंकि समय रहते पूछा गया यही सवाल किसी जीवन को बचा सकता है।













