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संपादकीय
05 Oct, 2026

आयुष्मान के नाम पर अटका इलाज: गरीब की सांस पर संकट

मध्यप्रदेश में एनएबीएच मान्यता और भुगतान संबंधी मुद्दों को लेकर निजी अस्पतालों ने आयुष्मान के तहत भर्ती रोकने की घोषणा की है, जिससे मरीजों पर असर की चिंता बढ़ी

भोपाल, 05 अक्टूबर।

आयुष्मान भारत योजना जब शुरू हुई थी तो लगा था कि अब गरीब को इलाज के लिए दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा। कार्ड होगा तो इलाज होगा, लेकिन मध्य प्रदेश में आज वही कार्ड जेब में लेकर मरीज अस्पताल के गेट पर खड़ा है और गेट बंद है। भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में आज से निजी अस्पतालों ने आयुष्मान के तहत भर्ती बंद कर दी है और आठ अक्टूबर से पूरे प्रदेश के पचपन जिलों में यही स्थिति होने की चेतावनी दी गई है। यह सिर्फ हड़ताल नहीं है, यह उस भरोसे का टूटना है जो सरकार ने गरीब को दिया था।

सरकार ने कहा है कि आयुष्मान से जुड़े अस्पतालों को एनएबीएच मान्यता लेनी होगी। एनएबीएच यानी अस्पताल की गुणवत्ता का प्रमाण पत्र। सुनने में यह अच्छा लगता है कि मरीज को अच्छी गुणवत्ता मिले, लेकिन हकीकत यह है कि प्रदेश के अस्सी प्रतिशत छोटे निजी अस्पताल बीस से पचास बिस्तरों वाले हैं। उनके पास इतना स्टाफ और बजट नहीं है कि वे लाखों रुपये खर्च करके यह प्रमाण पत्र ले सकें। इसके लिए अलग से प्रशिक्षण चाहिए, रिकॉर्ड मेंटेन करना पड़ता है और हर साल ऑडिट होता है। छोटे शहरों के अस्पताल संचालक कहते हैं कि वे पहले ही कम पैकेज में इलाज कर रहे हैं। ऊपर से भुगतान महीनों तक अटका रहता है। ऐसे में नई शर्त उनके गले में फंदे जैसी है।

अस्पतालों की नाराजगी सिर्फ एनएबीएच को लेकर नहीं है। बड़ी वजह भुगतान भी है। कई अस्पतालों का कहना है कि उनके क्लेम बिना कारण रिजेक्ट कर दिए जाते हैं। सीपीडी रिजेक्शन के नाम पर बिल रोक लिए जाते हैं। छह-छह महीने तक पैसा नहीं आता। ऐसे में अस्पताल का खर्च कैसे चलेगा? स्टाफ की सैलरी, दवा, बिजली, पानी, सबका बोझ अस्पताल पर है। जब पैसा ही नहीं मिलेगा तो वह मरीज को भर्ती कैसे करेगा? सरकार कहती है गुणवत्ता दो, लेकिन जब भुगतान की गुणवत्ता ही खराब हो तो अस्पताल क्या करे?

आज से जो बंद शुरू हुआ है, वह सिर्फ चार बड़े शहरों में है, लेकिन इन चार शहरों में ही प्रदेश की बड़ी आबादी इलाज के लिए आती है। भोपाल में हमीदिया पहले से भरा है, इंदौर में एमवाय में जगह नहीं है। जबलपुर और ग्वालियर के सरकारी अस्पतालों में भी यही हाल है। यदि निजी अस्पतालों ने हाथ खींच लिया तो सरकारी अस्पतालों पर दबाव दोगुना हो जाएगा। लाइनें लंबी होंगी और गरीब को बिना इलाज के लौटना पड़ेगा। आठ अक्टूबर के बाद तो स्थिति और बिगड़ेगी, क्योंकि तब छोटे जिलों के अस्पताल भी बंद हो जाएंगे, जहां सरकारी विकल्प भी बहुत कमजोर हैं।

एक मजदूर, जो भोपाल के करोंद में रहता है, उसके पिता को दिल का दौरा पड़ा है। उसके पास आयुष्मान कार्ड है। वह निजी अस्पताल पहुंचता है तो उसे कहा जाता है कि कार्ड नहीं चलेगा, नकद जमा करो। उसके पास दस हजार रुपये भी नहीं हैं। वह क्या करेगा? वह सरकारी अस्पताल की ओर भागेगा। वहां बिस्तर नहीं मिलेगा तो वह साहूकार से कर्ज लेगा। यही तो वह स्थिति थी, जिसे रोकने के लिए आयुष्मान लाई गई थी। आज वही स्थिति फिर लौट रही है। योजना कागज पर है, जमीन पर नहीं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि अस्पतालों की गुणवत्ता सुधरनी चाहिए। मरीज को साफ बिस्तर, प्रशिक्षित नर्स और सही इलाज मिलना चाहिए, लेकिन गुणवत्ता का मतलब सिर्फ एक प्रमाण पत्र नहीं होता। सरकार को चाहिए था कि वह अस्पतालों को सुधारने में मदद करती, छोटे अस्पतालों को एनएबीएच के लिए अनुदान देती, प्रशिक्षण देती और धीरे-धीरे इसे लागू करती। एक झटके में शर्त थोपने से सुधार नहीं होता, बल्कि विद्रोह होता है। यही आज हो रहा है।

समाधान यह है कि एनएबीएच को अनिवार्य नहीं, बल्कि प्रोत्साहन आधारित बनाया जाए। जो अस्पताल एनएबीएच लेगा, उसे पैकेज में दस प्रतिशत अतिरिक्त दिया जाए। इससे अस्पताल खुद आगे आएंगे। भुगतान की प्रक्रिया को पंद्रह दिन के भीतर अनिवार्य किया जाए। हर रिजेक्शन का कारण लिखित में बताया जाए और उसकी अपील का सरल तरीका हो। जिला स्तर पर एक निगरानी समिति बने, जिसमें कलेक्टर, सीएमएचओ, निजी अस्पताल और मरीजों के प्रतिनिधि हों। यह समिति हर महीने बैठक कर समस्याएं सुलझाए। सरकार को यह भी समझना होगा कि निजी अस्पताल दुश्मन नहीं हैं। वे स्वास्थ्य व्यवस्था के साझीदार हैं। यदि साझीदार को ही अपमानित किया जाएगा तो व्यवस्था टूट जाएगी।

आयुष्मान योजना का नारा है कि कोई भी गरीब इलाज से वंचित न रहे, लेकिन आज उसी योजना के नाम पर गरीब वंचित हो रहा है। निजी अस्पताल संचालकों को भी सोचना होगा कि हड़ताल अंतिम हथियार नहीं होनी चाहिए। मरीज की जान से बड़ा कोई नियम नहीं होता। सरकार को भी सोचना होगा कि सख्ती से व्यवस्था नहीं चलती, संवाद से चलती है।

जनता सिर्फ इतना चाहती है कि जब वह अस्पताल पहुंचे तो उसे इलाज मिले। चाहे सरकारी हो या निजी, कार्ड चलना चाहिए और इज्जत के साथ इलाज होना चाहिए। यदि सरकार और निजी अस्पताल दोनों अपनी जिद पर अड़े रहे तो इसका खामियाजा जनता भुगतेगी और आने वाले समय में लोग इस योजना से भरोसा खो देंगे। भरोसा एक बार टूटता है तो प्रमाण पत्र से नहीं जुड़ता, वह सेवा से जुड़ता है। इसलिए समय रहते इस टकराव को रोकना जरूरी है, वरना आठ अक्टूबर के बाद प्रदेश में स्वास्थ्य का संकट गहरा जाएगा और उसकी जिम्मेदारी किसी एक की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की होगी।

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