नई दिल्ली, 05 अक्टूबर।
जब कोई विमान हजारों फीट की ऊंचाई पर होता है तो उसकी सुरक्षा केवल मशीन पर नहीं, बल्कि पायलट के मन और साहस पर टिकी होती है। हाल ही में एक भारतीय कैप्टन ने ऐसा ही साहस दिखाया है। तेल अवीव जा रहा विमान जब बीच आकाश में था, तभी कॉकपिट के भीतर एक अप्रत्याशित और हिंसक स्थिति पैदा हो गई। ऐसी स्थिति में सामान्य व्यक्ति अपना संतुलन खो देता है, लेकिन उस कैप्टन ने अपने घायल होने के बाद भी विमान को संभाला और 174 यात्रियों की जान को सुरक्षित रखा। विमान को सऊदी अरब के ताबुक में सुरक्षित उतारना कोई छोटी बात नहीं है। यह बहादुरी की मिसाल है।
संकट में संयम ही असली बहादुरी
कई लोग इस घटना के बाद पायलट की मानसिक और शारीरिक जांच की बात कर रहे हैं। जांच होना स्वाभाविक है और अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के नियमों के अनुसार जरूरी भी है, लेकिन जांच का अर्थ यह नहीं है कि हम उस बहादुरी पर सवाल उठाएं, जिसने सैकड़ों परिवारों को अनाथ होने से बचाया। सवाल उठाना आसान है, लेकिन उस ऊंचाई पर जब रक्त बह रहा हो और विमान तेजी से ऊंचाई खो रहा हो, तब विमान को संभालना कितना कठिन है, इसका अंदाजा जमीन पर बैठकर नहीं लगाया जा सकता। कैप्टन ने जो किया, वह पेशेवर क्षमता के साथ मानवीय जिम्मेदारी का सर्वोच्च उदाहरण है।
भारतीय पायलट पर पूरी दुनिया को गर्व
आज दुनिया में भारतीय पायलटों की मांग सबसे अधिक है। अमेरिका से लेकर यूरोप तक भारतीय पायलट अपनी कुशलता के लिए जाने जाते हैं। इस घटना में भी कैप्टन ने यह साबित किया कि भारतीय प्रशिक्षण और भारतीय संस्कार कितने मजबूत हैं। उसने अपने जोखिम के अनुसार अतिरिक्त तनाव सहा। सावधानी जरूरी है, यह वाक्य इस बात का प्रमाण है कि वह केवल तकनीकी रूप से ही नहीं, बल्कि नैतिक रूप से भी एक जिम्मेदार पायलट है। ऐसे पायलट पर सवाल उठाना उचित नहीं है, बल्कि उसे सम्मान देना उचित है, क्योंकि उसने विश्व स्तर पर भारत का मान बढ़ाया है।
यूरोप में मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन
यूरोपीय विमानन सुरक्षा व्यवस्था में पायलट चयन के दौरान मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन को बहुत महत्व दिया गया है। यूरोपीय नियमों के तहत यह मूल्यांकन परामर्श शुरू होने के 24 महीने के भीतर होना चाहिए। हालांकि, जोखिम के आधार पर अलग व्यवस्था संभव है, परंतु मेडिकल व्यवस्था में मानसिक स्वास्थ्य के साथ दल के साथ काम करने में आने वाली कठिनाइयों पर भी ध्यान दिया जाता है। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की राय ली जाती है। यह व्यवस्था बताती है कि पायलट की जांच कोई सजा नहीं है, बल्कि सुरक्षा को और मजबूत करने की प्रक्रिया है। लेकिन कुछ लोग इस प्रक्रिया को बहादुरी पर संदेह के रूप में पेश कर रहे हैं, जो गलत है।
ब्रिटेन में व्यवहार और तनाव पर भी नजर
ब्रिटेन की नागरिक विमानन प्राधिकरण की व्यवस्था में पायलट के मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाता है। साथ ही तनाव से निपटने की क्षमता, काम और निजी जीवन का दबाव, संबंधों से जुड़ी कठिनाइयां और परिचालन दल के साथ समन्वय जैसे पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाता है। यदि किसी समस्या के संकेत मिलते हैं तो विशेषज्ञ मूल्यांकन की व्यवस्था है। इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य की हर समस्या को खतरा मानना नहीं, बल्कि ऐसी स्थिति की पहचान करना है, जो उड़ान सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है। यह एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। इसे बहादुरी पर सवाल के रूप में देखना अन्याय होगा।
ऑस्ट्रेलिया में बिना पूर्व सूचना जांच
ऑस्ट्रेलिया की नागरिक विमानन व्यवस्था में सुरक्षा संवेदनशील विमानन कर्मचारियों के लिए शराब और पदार्थों की जांच का स्पष्ट प्रावधान है। इसमें उड़ान दल के साथ केबिन क्रू, रखरखाव कर्मचारी और अन्य सुरक्षा संवेदनशील भूमिकाएं शामिल हैं। नागरिक विमानन सुरक्षा प्राधिकरण बिना पूर्व सूचना के भी जांच कर सकता है। परीक्षण की स्थिति में संबंधित व्यक्ति को सुरक्षा संवेदनशील काम से हटाया जाता है और चिकित्सकीय मूल्यांकन तथा आवश्यक हस्तक्षेप की प्रक्रिया अपनाई जाती है। यह व्यवस्था बताती है कि दुनिया भर में सुरक्षा सर्वोपरि है, लेकिन सुरक्षा का अर्थ पायलट का अपमान नहीं है।
अमेरिका में नियमित मेडिकल निगरानी
अमेरिका में संघीय विमानन प्रशासन यानी एफएए के अनुसार एयरलाइन पायलटों को उनकी उड़ान की श्रेणी और उम्र के अनुसार नियमित मेडिकल परीक्षण से गुजरना होता है। यह अवधि छह महीने से पांच वर्ष तक हो सकती है। मेडिकल प्रक्रिया में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जानकारी भी शामिल है और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सकीय मूल्यांकन कराया जाता है। यह व्यवस्था भी यही बताती है कि जांच और निगरानी एक सतत प्रक्रिया है, जो हर पायलट के लिए समान है। इसे किसी एक घटना से जोड़कर किसी कैप्टन की बहादुरी पर सवाल उठाना सही नहीं है।
भारत आज दुनिया में अपनी रक्षा प्रणाली से लेकर अपनी विमानन सेवा तक हर क्षेत्र में धूम मचा रहा है। जब भारत में बना ब्रह्मोस दुनिया में अपनी धाक जमा रहा है, तब भारत का पायलट भी दुनिया में अपनी कुशलता का परचम लहरा रहा है। ऐसे समय में अपने ही नायक पर सवाल उठाना उचित नहीं है। कैप्टन ने जो किया, वह केवल एक नौकरी नहीं थी, वह मानवता की सेवा थी। उसने अपने घावों की परवाह किए बिना 174 लोगों को नया जीवन दिया। क्या यह बहादुरी नहीं है? क्या यह गौरव की बात नहीं है?
जांच और सम्मान दोनों अलग-अलग चीजें हैं। जांच व्यवस्था का हिस्सा है और सम्मान बहादुरी का पुरस्कार है। हमें दोनों को अलग रखना चाहिए। कैप्टन की बहादुरी पर सवाल उठाना उस वर्दी पर सवाल उठाने जैसा है, जो हर दिन लाखों लोगों को सुरक्षित आकाश में पहुंचाती है। भारत का गौरव विश्व स्तर पर बढ़ाने वाले ऐसे पायलटों को हमें सिर-आंखों पर बिठाना चाहिए, न कि कठघरे में खड़ा करना चाहिए। यही सच्ची राष्ट्रभक्ति होगी।














