शिलांग, 05 अक्टूबर।
हमने समय-रेखा बना रखी है, कब पढ़ना है, कब कमाना है और कब थम जाना है। पचास पार करते ही पूछा जाता है, अब क्या पढ़ोगे? मेघालय के री-भोई जिले के एक किसान ने इस धारणा को चुनौती दी है। सैंतीस साल पहले आर्थिक मजबूरी में छूटी किताबों को 59 साल की उम्र में फिर उठाना परीक्षा की तैयारी नहीं, उस सोच को चुनौती है, जो मानती है कि सीखने की उम्र खत्म हो जाती है। उम्र के साथ सीखने की गति बदलती है, लेकिन अनुभव समझ को गहरा करता है।
परिवार की जिम्मेदारी के कारण स्कूल छूट जाना लाखों भारतीयों की कहानी है। पेट की भूख कई बार किताब की भूख पर भारी पड़ती है। वर्षों बाद जीवन स्थिर होता है, तो वही अधूरापन व्यक्ति को फिर पढ़ाई की ओर खींचता है। 10वीं की परीक्षा यहां नौकरी का टिकट नहीं, आत्मसम्मान का प्रमाण है।
मेघालय सरकार का सेकंड चांस लर्निंग प्रोग्राम इसी सोच का परिणाम है कि शिक्षा जीवन भर चलने वाली यात्रा है। 9 हजार से अधिक लोगों का प्राइवेट कैंडिडेट के रूप में पंजीकरण बताता है कि ऐसे अवसर की जरूरत है। स्कूल छूटने के बाद बंद हुआ दरवाजा फिर खोलना व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
सैंतीस साल में पाठ्यक्रम और परीक्षा का तरीका बदल गया, फिर भी तैयारी करना हौसले की मिसाल है। समाज को सीखना चाहिए कि किसी को उम्र से न आंकें, आर्थिक मजबूरी से पढ़ाई छूटना व्यक्ति की असफलता नहीं और सीखने को रोजगार से भी न जोड़ें। 59 साल में 10वीं की तैयारी करने वाला व्यक्ति अकेला नहीं है। उसके साथ उन लोगों की उम्मीद है, जो पूछते हैं, क्या अब भी देर नहीं हुई? जवाब है, सीखने में कभी देर नहीं होती, बस रुकना नहीं है।













