भोपाल, 05 अक्टूबर।
मध्य प्रदेश में हजारों युवा दिन-रात एक कर असिस्टेंट प्रोफेसर बनने का सपना देखते हैं। वे नेट निकालते हैं, सेट निकालते हैं, पीएचडी करते हैं, लिखित परीक्षा में पसीना बहाते हैं और जब मेरिट में नाम आता है तो लगता है कि मंजिल मिल गई। लेकिन दस्तावेज जांच की टेबल पर वही सपना टूट जाता है। कहा जाता है कि आपकी डिग्री इस विषय से मेल नहीं खाती, आप अयोग्य हैं। हाल ही में चार प्रतिभागियों के साथ यही हुआ और मामला उच्च न्यायालय तक पहुंचा। तीन प्रतिभागियों को राहत मिली और एक को नहीं मिली। यह कहानी सिर्फ चार लोगों की नहीं है, यह उस पूरी पीढ़ी की कहानी है जो नई पढ़ाई पढ़कर पुरानी भर्ती व्यवस्था में फंस रही है।
उच्च शिक्षा विभाग ने प्राणीशास्त्र के लिए ग्यारह सह विषयों की सूची तय की थी। उस सूची में बायोटेक्नोलॉजी और पर्यावरण विज्ञान जैसे विषय भी शामिल थे, लेकिन भर्ती एजेंसी ने बायोटेक्नोलॉजी में तकनीकी डिग्री को प्राणीशास्त्र के लिए मान्य नहीं माना। एक प्रतिभागी के पास बायोटेक्नोलॉजी में उच्च तकनीकी डिग्री थी। साथ में जीवन विज्ञान में राष्ट्रीय पात्रता और जैव विज्ञान में शोध उपाधि भी थी। फिर भी उन्हें बाहर कर दिया गया। न्यायालय ने विभागीय आदेश को ही आधार बनाया और कहा कि जब विभाग ने खुद बायोटेक्नोलॉजी को सह विषय माना है तो उसे अमान्य कैसे किया जा सकता है। उन्हें राहत दे दी गई। यानी सूची में हो तो ही मान्य, वरना नहीं।
इसी तर्क पर उस प्रतिभागी को भी राहत मिली, जिनके पास प्राणीशास्त्र में स्नातकोत्तर और पर्यावरण विज्ञान में राष्ट्रीय पात्रता थी। पर्यावरण विज्ञान सूची में था, इसलिए मान्य हो गया। संगीत विषय के प्रतिभागी को भी संगीत में ही स्नातकोत्तर और राज्य व राष्ट्रीय पात्रता होने के कारण राहत मिल गई। लेकिन एक प्रतिभागी को राहत नहीं मिली, क्योंकि उनका विषय एनिमल बायोटेक्नोलॉजी था, जो ग्यारह सह विषयों की सूची में शामिल नहीं था। उन्होंने समकक्षता प्रमाण पत्र भी लगाया था, लेकिन न्यायालय ने साफ कहा कि समकक्षता तय करना विशेषज्ञों का काम है। सिर्फ प्रमाण पत्र के आधार पर सूची से बाहर के विषय को जोड़ा नहीं जा सकता।
आज की शिक्षा बदल गई है। अब कोई विषय अकेला नहीं पढ़ाया जाता। जीव विज्ञान तकनीक से जुड़ गया है, पर्यावरण विज्ञान जीव विज्ञान से जुड़ गया है और संगीत भी अब विज्ञान और तकनीक से जुड़ रहा है। नई शिक्षा नीति कहती है कि अंतरविषयक पढ़ाई को बढ़ावा दिया जाए, लेकिन भर्ती प्रक्रिया अभी भी पुरानी लीक पर चल रही है। वह अभी भी कहती है कि प्राणीशास्त्र के लिए सिर्फ प्राणीशास्त्र की डिग्री चाहिए। यह विरोधाभास युवाओं को भ्रम में डाल रहा है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे नए विषय पढ़ें या पुराने विषयों तक ही सीमित रहें।
जब एक युवा सात साल तक शोध करता है, लाखों रुपये खर्च करता है, परिवार की उम्मीदों का बोझ उठाता है और दस्तावेज जांच में अयोग्य घोषित हो जाता है तो उसका हौसला टूट जाता है। कई युवा उम्र सीमा पार कर जाते हैं, कई मानसिक तनाव से गुजरते हैं। यह सिर्फ एक व्यक्ति का नुकसान नहीं है, यह पूरे समाज का नुकसान है, क्योंकि योग्य शिक्षक बाहर हो जाते हैं और कॉलेजों में पढ़ाने के लिए वही पुरानी सोच वाली व्यवस्था बनी रहती है। इसका सीधा असर छात्रों की गुणवत्ता पर पड़ता है और प्रदेश की उच्च शिक्षा कमजोर होती है।
छात्रों को अब जागरूक होना होगा। सिर्फ विज्ञापन पढ़कर आवेदन करना काफी नहीं है। विभागीय आदेश, सह विषय सूची और न्यायालय के फैसलों को भी पढ़ना होगा। यदि आपके पास अंतरविषयक डिग्री है तो पहले ही विभाग से लिखित में पूछ लें कि आपकी डिग्री मान्य है या नहीं। समकक्षता प्रमाण पत्र को अंतिम सत्य न मानें, क्योंकि न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि समकक्षता तय करना विशेषज्ञ समिति का काम है। अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आवाज उठाना भी जरूरी है।
सरकार और भर्ती एजेंसी को भी अब नींद से जागना होगा। सबसे पहले सह विषयों की सूची को हर साल अपडेट किया जाए। एक स्थायी विशेषज्ञ समिति बनाई जाए, जो नए विषयों की समीक्षा करे और उन्हें समय पर सूची में जोड़े। दूसरा, भर्ती विज्ञापन में ही स्पष्ट लिखा जाए कि कौन सी डिग्री मान्य है और कौन सी नहीं, ताकि बाद में विवाद न हो। एक ऑनलाइन पोर्टल बनाया जाए, जहां प्रतिभागी अपनी डिग्री अपलोड कर पहले ही जान सके कि वह योग्य है या नहीं। दस्तावेज जांच लिखित परीक्षा से पहले की जाए, ताकि किसी को बाद में निराशा न हो।
यह समझना होगा कि योग्यता का अर्थ सिर्फ कागज नहीं है। योग्यता का अर्थ ज्ञान, समझ और पढ़ाने की कला है। यदि किसी में ये तीनों हैं तो उसे सिर्फ डिग्री के नाम पर बाहर करना अन्याय है। यह समय है कि हम डिग्री से ज्यादा ज्ञान को महत्व दें और युवाओं के सपनों को कागज की दीवार में न उलझाएं। तभी प्रदेश की उच्च शिक्षा में नई रोशनी आएगी और युवाओं का भरोसा व्यवस्था पर बना रहेगा।














