नई दिल्ली, 05 अक्टूबर।
एक समय था जब दुनिया भारत को हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार कहती थी और आज वही दुनिया भारत को हथियारों का भरोसेमंद विक्रेता कह रही है। यह बदलाव केवल आंकड़ों का नहीं है, यह सोच का बदलाव है। रक्षा निर्यात ने जब 38,424 करोड़ का आंकड़ा पार किया तो यह संदेश गया कि भारत अब केवल अपनी सेना के लिए नहीं, बल्कि दुनिया की सेनाओं के लिए भी सोचता है। अस्सी से अधिक देशों तक भारतीय रक्षा उत्पाद पहुंच रहे हैं और निर्यातकों की संख्या 145 हो गई है। यह धूम किसी विज्ञापन से नहीं, बल्कि गुणवत्ता और भरोसे से पैदा हुई है।
ब्रह्मोस की गर्जना से गूंजा अंतरराष्ट्रीय बाजार
ब्रह्मोस नाम ही अब बाजार में ब्रांड बन गया है। छह सौ मिलियन डॉलर से अधिक का सौदा कर इस मिसाइल ने बता दिया है कि भारतीय तकनीक किसी से कम नहीं है। यह दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जो जमीन, समुद्र और हवा, तीनों से वार कर सकती है। फिलीपींस ने इसे अपनाया और अब वियतनाम और इंडोनेशिया भी कतार में हैं। रक्षा सचिव के अनुसार, ब्रह्मोस इस बदलती तस्वीर का प्रमुख उदाहरण बनकर उभरी है। जब कोई देश ब्रह्मोस खरीदता है तो वह सिर्फ मिसाइल नहीं खरीदता, वह भारत की प्रतिबद्धता खरीदता है कि संकट में भारत साथ खड़ा रहेगा।
आयातक से निर्यातक बनने की कहानी
कभी हम अपनी जरूरत का सत्तर प्रतिशत सामान विदेशों से लाते थे। हमारे पास पैसा था, लेकिन तकनीक उधार की थी। फिर आत्मनिर्भर भारत का संकल्प आया। सरकार ने निजी क्षेत्र के लिए दरवाजे खोले, डीआरडीओ और निजी उद्योग ने हाथ मिलाया और खरीद में स्वदेशी को प्राथमिकता मिली। परिणाम यह हुआ कि वित्त वर्ष 2025-26 में निजी क्षेत्र ने 17,353 करोड़ और सरकारी उपक्रमों ने 21,071 करोड़ का निर्यात किया। यानी सरकारी क्षेत्र में 151 प्रतिशत और निजी क्षेत्र में 14 प्रतिशत की वृद्धि। यह कहानी बताती है कि जब देश अपनी ताकत पर भरोसा करता है तो दुनिया भी उस पर भरोसा करती है।
क्यों दुनिया को पसंद आ रहा है भारतीय सामान?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में हथियार बेचना केवल कीमत का खेल नहीं है। यह भरोसे का खेल है। बड़े देश हथियार बेचते समय कई शर्तें लगाते हैं, कई बार वे राजनीति भी करते हैं, लेकिन भारत की नीति अलग है। भारत हथियार के साथ सम्मान बेचता है, दबाव नहीं। यह बात छोटे देशों को सबसे ज्यादा पसंद आ रही है। दक्षिण-पूर्व एशिया के देश, जो समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, वे भारत की तटीय रक्षा प्रणाली को अपनी सेना की शान बनाना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि भारत कभी पीठ नहीं दिखाएगा। यही कारण है कि भारत की धूम है।
नौजवानों के हाथों में नया भविष्य
इस धूम के पीछे हजारों युवा हाथ हैं, जो हैदराबाद, नागपुर और लखनऊ की फैक्ट्रियों में दिन-रात काम कर रहे हैं। उनके लिए यह आंकड़ा केवल रुपया नहीं है, यह उनके पसीने का सम्मान है। आज का इंजीनियर अब विदेश जाने का सपना नहीं देखता, वह भारत में रहकर दुनिया के लिए हथियार बनाना चाहता है। यह बदलाव रोजगार का भी है और गर्व का भी। जब भारत का बना रडार अफ्रीका में चलता है या भारत की बनी तोप एशिया में गरजती है तो हर भारतीय का सीना चौड़ा हो जाता है।
समुद्र से आकाश तक भारतीय पहचान
पहले भारत केवल गोला-बारूद और छोटे हथियार बेचता था। आज भारत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, रडार, तोपें और मिसाइलें बेच रहा है। यानी भारत अब छोटे सामान का नहीं, बड़ी तकनीक का निर्यातक बन गया है। यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की धूम का असली कारण है। दुनिया जानती है कि भारत सस्ता नहीं, बल्कि टिकाऊ और भरोसेमंद बेचता है और यही भरोसा भारत को दो ट्रिलियन डॉलर के वैश्विक रक्षा बाजार में नई ताकत बना रहा है।
आगे का लक्ष्य और बड़ा है
अभी यह शुरुआत है। 38,424 करोड़ का रिकॉर्ड एक पड़ाव है, मंजिल नहीं। मंजिल है पचास हजार करोड़ और फिर एक लाख करोड़। इसके लिए हमें अनुसंधान में निवेश को तीन गुना करना होगा, इंजन और चिप जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों में आत्मनिर्भर होना होगा और सरकारी प्रक्रियाओं को और तेज करना होगा। ब्रह्मोस ने रास्ता दिखाया है। अब तेजस, प्रचंड, आकाश और अन्य प्रणालियों को भी इसी रास्ते पर दुनिया में धूम मचानी है। वह दिन दूर नहीं जब भारतीय विमानवाहक भी दुनिया की नौसेनाओं की शान बनेंगे।
दुनिया के बाजार में भारत की धूम केवल व्यापार की धूम नहीं है। यह सम्मान की धूम है। यह संदेश है कि भारत अब किसी पर निर्भर नहीं है। भारत अपने दम पर अपनी और दुनिया की सुरक्षा कर सकता है। ब्रह्मोस की गर्जना ने यह संदेश दे दिया है कि भारत का समय आ गया है। यह समय गर्व करने का है और अधिक मेहनत करने का है, ताकि आने वाले वर्षों में हर महाद्वीप में भारत की तकनीक की धूम रहे।














