नई दिल्ली, 05 अक्टूबर।
आज के समय में दो शब्द सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। एक है डिजिटल अरेस्ट और दूसरा है एसआईआर, यानी वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनरीक्षण। दोनों शब्दों में डर है, दोनों में अरेस्ट जैसा एहसास है, लेकिन दोनों के पीछे की कहानी एक जैसी है। डिजिटल अरेस्ट कानूनी प्रक्रिया नहीं है, यह साइबर ठगों की बनाई हुई फर्जी दुनिया है। ठीक वैसे ही पॉलिटिकल अरेस्ट भी कानूनी नहीं है, यह सत्ता के ठगों की बनाई हुई सियासी दुनिया है। दोनों में फर्जी पहचान बताई जाती है, दोनों में झूठा डर दिखाया जाता है और दोनों का अंतिम लक्ष्य एक ही है, पैसा लूटो या सत्ता लूटो।
साइबर ठग खुद को सीबीआई, पुलिस, कस्टम या इनकम टैक्स अधिकारी बताते हैं। वे वीडियो कॉल पर वर्दी पहनकर आते हैं और कहते हैं कि तुम्हारे नाम पर अपराध दर्ज है, अब तुम्हें डिजिटल कैद में रहना होगा। जो डर जाता है, वह कैद हो जाता है और फिर पैसे देकर छूटने की कोशिश करता है। ठीक इसी तरह सियासी ठग खुद को लोकतंत्र का रक्षक और संविधान का पहरेदार बताते हैं। वे कहते हैं कि तुम्हारा वोट चोरी हो रहा है, तुम्हारा नाम वोटर लिस्ट से कट रहा है, लोकतंत्र खतरे में है। जो इस डर में आ जाता है, वह पॉलिटिकल कैद में चला जाता है और फिर उस डर का लाभ उन्हें वोट के रूप में मिलता है। तरीका अलग है, लेकिन मानसिकता एक ही है।
सरकार के तमाम प्रयासों के बाद भी डिजिटल अरेस्ट की घटनाएं रुक नहीं रही हैं, क्योंकि जागरूकता की कमी है। लोग डर जाते हैं। उसी तरह चुनाव आयोग के तमाम स्पष्टीकरण के बाद भी पॉलिटिकल अरेस्ट का डर फैलाया जा रहा है। वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या काटने का डर दिखाया जा रहा है। वोट चोरी का झूठा नेरेटिव बनाया जा रहा है। चुनावी प्रक्रिया के अंपायर, यानी इलेक्शन कमीशन को ही चोर घोषित किया जा रहा है। इसका लक्ष्य केवल एक है कि जनता में डर का माहौल बने और उस डर से सियासी फसल काटी जाए। यह लोकतंत्र की रक्षा नहीं है, यह लोकतंत्र के नाम पर डर की खेती है।
इस पूरे खेल में डिजिटल मीडिया की भूमिका बहुत बड़ी है। मुख्य मीडिया फिर भी बिना प्रमाण के कुछ भी कहने से बचता है, लेकिन डिजिटल मीडिया हर हाथ में है, हर मोबाइल में है। पॉलिटिकल अरेस्ट के सियासी फ्रॉड के लिए इसका जमकर उपयोग हो रहा है। एक झूठा वीडियो, एक कटा-पिटा आंकड़ा और एक भड़काऊ कैप्शन, बस इतने से ही लोकतंत्र खतरे में है का माहौल बना दिया जाता है। डिजिटल मीडिया हथियार भी है और युद्ध का मैदान भी। वहीं पर आरोप लगते हैं और वहीं पर सफाई भी देनी पड़ती है। इसीलिए जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है, चाहे वह साइबर ठगी हो या सियासी ठगी।
विपक्षी इंडिया गठबंधन अब पॉलिटिकल अरेस्ट के खिलाफ लोकतंत्र बचाओ मार्च निकालने का ऐलान कर रहा है। इसमें सबसे आगे कांग्रेस है। यह वही पार्टी है जिसने लोकतंत्र को खत्म करने में कोई कमी नहीं रखी। आपातकाल कांग्रेस की ही देन है। वह ऐसा काला अध्याय है, जिसे यह देश कभी नहीं भूल सकता। जब देश की सबसे बड़ी अदालत ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव करप्ट प्रैक्टिसेज के लिए रद्द किया तो पूरे देश पर आपातकाल थोप दिया गया। मीडिया पर सेंसरशिप लगाई गई। यहां तक कानून बनाने की कोशिश हुई कि प्रधानमंत्री के खिलाफ अदालत में केस ही नहीं हो सकता। जिसकी विरासत लोकतंत्र की हत्या की रही हो, वह अगर आज लोकतंत्र बचाओ मार्च की अगुवाई करे तो इसे ही पॉलिटिकल अरेस्ट कहा जाएगा।
बड़ी मुश्किल से ईवीएम की इज्जत बची है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर चुनाव आयोग तक ने बार-बार बताया कि ईवीएम सुरक्षित है, लेकिन अब कांग्रेस फिर बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग कर रही है। यह वही कांग्रेस है, जिसके नेता राजीव गांधी ने ईवीएम से चुनाव के कानून को क्रांतिकारी कदम बताया था। तब ईवीएम क्रांति थी और आज वही प्रतिगामी हो गई। जब तक जीत मिलती है, तब तक ईवीएम ठीक है और जैसे ही हार मिलती है तो ईवीएम खराब हो जाती है। यह लोकतंत्र के प्रति सम्मान नहीं है, यह हार को पचा न पाने की आदत है। जो जनादेश को ही चोरी मान ले, वह लोकतंत्र का रक्षक कैसे हो सकता है?
एसआईआर पर दोहरा चरित्र भी सामने है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मांग कर रहे हैं कि एसआईआर को रद्द किया जाए और पुरानी वोटर लिस्ट पर ही चुनाव कराए जाएं। यह मांग कितनी अजीब है, इसका अंदाजा इसी से लगता है कि भला हो डिजिटल मीडिया का, जिसने कांग्रेस के पुराने बयान सामने ला दिए। पहले कांग्रेस ही वोटर लिस्ट में बोगस नामों को लेकर सबसे ज्यादा हंगामा करती थी और वोटर लिस्ट सुधार को चुनाव सुधार का बड़ा कदम बताती थी। आज जब चुनाव आयोग वही काम कर रहा है तो उसे गड़बड़ी दिखाई दे रही है। चुनाव आयोग साफ बता रहा है कि जो नाम हटाए गए हैं, उनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है जो मृत हो चुके हैं या अपना स्थान छोड़कर दूसरी जगह शिफ्ट हो गए हैं। अगर पुरानी लिस्ट पर ही चुनाव कराना है तो इसका अर्थ है कि मृत लोगों के नाम भी लिस्ट में बने रहें और जो लोग वहां रहते ही नहीं हैं, उनके नाम पर भी वोट पड़े। यह लोकतंत्र की रक्षा है या लोकतंत्र की हत्या?
हार को शालीनता से स्वीकारना ही लोकतंत्र है। लोकतंत्र का पहला नियम है कि हार को शालीनता से स्वीकार किया जाए। जिसमें यह शालीनता नहीं है, वह केवल रक्षा का दिखावा कर सकता है। कांग्रेस आज अपने अतीत की गलतियों के बोझ से दबी हुई है और उसकी वर्तमान लीडरशिप देश की भावनाओं से पूरी तरह डिस्कनेक्ट है। उसे लगता है कि वह जो सोचती है, वही देश सोचता है, लेकिन देश जो सोचता है, वह जनादेश में बताता है। जो जनादेश को ही चोरी बता दे, वह हर बार सीनाजोरी को ही आगे रखता है।
पॉलिटिकल अरेस्ट की यह सियासत अब देश के विकास की गति को कमजोर कर रही है। सिस्टम में सुधार की मंशा कम और सिस्टम पर से जनता का भरोसा कम करने की मंशा ज्यादा दिखाई देती है। डिजिटल अरेस्ट और पॉलिटिकल अरेस्ट दोनों में एक समानता है। दोनों में डर बेचा जाता है। एक में साइबर ठग वर्दी पहनकर डर बेचते हैं, दूसरे में सियासी ठग संविधान की कॉपी लेकर डर बेचते हैं। एक का लक्ष्य पैसा लूटना है, दूसरे का लक्ष्य सत्ता लूटना है। दोनों से बचने का तरीका एक ही है, जागरूकता और कानून पर भरोसा। किसी भी गलती या अव्यवस्था को केवल कोर्ट ही खारिज कर सकता है। सियासत सड़कों पर हो सकती है, लेकिन सुधार के लिए कानूनी प्रक्रिया ही अंतिम रास्ता है। जनता को यह समझना होगा कि जो लोग लोकतंत्र खतरे में है का झूठा अलार्म बजा रहे हैं, वही लोग अतीत में लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बने थे। इसलिए डर से बाहर निकलना ही असली लोकतंत्र की रक्षा है।














