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संपादकीय
05 Oct, 2026

पितृ पक्ष पर पिंडदान और जीवित माता-पिता का अपमान: श्राद्ध की थाली और वृद्धाश्रम की चौखट

पितृ पक्ष की परंपराओं के बीच जीवित माता-पिता की सेवा, सम्मान और उन्हें अकेलेपन से बचाने की जिम्मेदारी पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

भोपाल, 05 अक्टूबर।

पितृ पक्ष आता है तो हम बहुत शिद्दत से अपने पूर्वजों को याद करते हैं। पंडित बुलाए जाते हैं, पिंडदान होता है, ब्राह्मण भोज कराया जाता है, तर्पण किया जाता है और हम कहते हैं कि हमारे पितर प्रसन्न होंगे, हमें आशीर्वाद देंगे। लेकिन एक सवाल, जो इस पूरे कर्मकांड के बीच कहीं खो जाता है, वह यह है कि जब हमारे माता-पिता जीवित थे, तब हमने उनके साथ कैसा व्यवहार किया था? आज लाखों बुजुर्ग वृद्धाश्रम, आश्रय गृह और सेवा सदन में रहने को मजबूर हैं। उनके बेटे हैं, बेटियां हैं, पोते हैं, फिर भी वे अनाथों की तरह जीवन काट रहे हैं। आखिर हम इतने निष्ठुर कैसे हो गए?

पेट काटकर पाला और हमने हाथ काटकर छोड़ा। जिस मां ने अपना पेट काटकर बच्चों को पाला, जिस पिता ने अपनी इच्छाओं को मारकर बच्चों को पढ़ाया, लिखाया और बड़ा किया, उसी मां-बाप को जब सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब हम उन्हें बोझ समझने लगते हैं। बचपन में जब बच्चा रात भर रोता था तो मां जागती थी, पिता कंधे पर लेकर घूमता था। तब कोई हिसाब नहीं था कि कितना खर्च हुआ, कितनी नींद खराब हुई। लेकिन जब वही मां-बाप बूढ़े होते हैं, उनकी आंखों से कम दिखता है, कानों से कम सुनाई देता है, तो हम हिसाब लगाने लगते हैं कि इन पर कितना खर्च हो रहा है, कितनी परेशानी हो रही है। यह कैसा न्याय है?

वृद्धाश्रमों की बढ़ती भीड़ क्या कहती है? पहले कहा जाता था कि वृद्धाश्रम में वे लोग रहते हैं, जिनका कोई नहीं होता, लेकिन आज हकीकत बदल गई है। आज वृद्धाश्रम में वे लोग ज्यादा हैं, जिनके बेटे विदेश में हैं, बड़ी नौकरी में हैं, बड़े घरों में रहते हैं। कई बुजुर्ग तो खुद बताते हैं कि घर में जगह की कमी नहीं थी, दिल में जगह की कमी हो गई थी। बहू को सास से परेशानी थी, बेटे को पिता की टोका-टोकी से परेशानी थी और धीरे-धीरे उन्हें समझा दिया गया कि आप वृद्धाश्रम में ज्यादा सुखी रहेंगे। वहां सेवा होगी, वहां आपके जैसे लोग मिलेंगे। यह कैसी सेवा है, जो अपनों से दूर कर दे?

हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि जीवित माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा श्राद्ध है, लेकिन हम उल्टा कर रहे हैं। जीवित माता-पिता को हम वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं और मरने के बाद उनके नाम पर बड़ा भोज करते हैं, फोटो पर माला लगाते हैं, लोगों को बताते हैं कि हमने अपने पिता के लिए इतना खर्च किया। यह कैसी श्रद्धा है, जो जीते जी नहीं दिखाई देती और मरने के बाद दिखावे में बदल जाती है? यदि मां-बाप भूखे रहे, प्यासे रहे, अकेले रहे तो मरने के बाद हलवा-पूरी खिलाने से क्या आत्मा तृप्त होगी? आत्मा तो जीते जी तृप्त होती है, एक गिलास पानी देने से, एक मीठा बोल बोलने से।

हम निष्ठुर क्यों होते जा रहे हैं? इसका कारण एक नहीं है, कई कारण हैं। हमारी सोच में बदलाव आया है। हमने रिश्तों को भी लेन-देन बना दिया है। हम सोचते हैं कि मां-बाप ने जो किया, वह उनका कर्तव्य था, अब हमारा कोई कर्तव्य नहीं है। दिखावा भी एक कारण है। हम बाहर की दुनिया में बहुत व्यस्त हो गए हैं, सोशल मीडिया में व्यस्त हो गए हैं, लेकिन घर के बुजुर्गों के लिए समय नहीं है। सहनशक्ति की कमी, छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा और फिर अलग होने का चलन, बच्चों को बचपन से ही संस्कार न देना, हमने बच्चों को अंग्रेजी सिखाई, गणित सिखाया, कंप्यूटर सिखाया, लेकिन बड़ों का सम्मान करना नहीं सिखाया। तो वही बच्चे बड़े होकर हमें वृद्धाश्रम का रास्ता दिखाते हैं।

बुजुर्ग हमसे धन नहीं मांगते, बड़ा घर नहीं मांगते। वे सिर्फ थोड़ा समय मांगते हैं, थोड़ा प्यार मांगते हैं। वे चाहते हैं कि शाम को कोई उनके पास बैठे, उनकी बात सुने, उनकी कहानी सुने। वे चाहते हैं कि परिवार में उनकी मौजूदगी का एहसास रहे। उन्हें यह न लगे कि वे फालतू हैं। यदि हम इतना भी नहीं दे सकते तो हमारा शिक्षित होना किस काम का, हमारी तरक्की किस काम की?

पितृ पक्ष पर यदि सच में अपने पितरों को याद करना है तो एक संकल्प लीजिए कि अपने जीवित माता-पिता को कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे, उन्हें वृद्धाश्रम नहीं भेजेंगे, उनके बुढ़ापे की लाठी बनेंगे। यदि आपके आसपास कोई बुजुर्ग वृद्धाश्रम में है तो महीने में एक बार उनसे मिलने जाइए, उनसे बात कीजिए। हो सके तो अपने घर के बुजुर्गों को वापस घर लाइए। सरकार को भी चाहिए कि वह ऐसे बेटों पर सख्त कानून लागू करे, जो सक्षम होते हुए भी माता-पिता को छोड़ देते हैं। लेकिन कानून से ज्यादा जरूरत संस्कार की है। जब आप पितृ पक्ष में अपने पितरों को याद कर रहे हों तो एक बार आंख बंद करके सोचिए कि क्या आपके माता-पिता आपके साथ हैं, क्या वे खुश हैं, क्या वे खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं? यदि जवाब हां है तो आपका श्राद्ध सफल है। यदि जवाब नहीं है तो सारे पिंडदान बेकार हैं, क्योंकि भूखे पेट को भोज नहीं, प्यार चाहिए और अकेले मन को मंत्र नहीं, साथ चाहिए। वृद्धाश्रम की दीवारों पर लिखी उदासी को मिटाना है तो हमें अपने घर के दरवाजे खोलने होंगे और दिल में जगह बनानी होगी। तभी पितृ पक्ष सार्थक होगा, तभी पूर्वजों की आत्मा सच में शांत होगी।

-अरूणा शर्मा, भोपाल

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