समरकंद, 05 अक्टूबर।
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने समरकंद की धरती से एक ऐसी बात कही है, जो आने वाले समय में न्याय की परिभाषा तय करेगी। उन्होंने साफ कहा कि फैसला लेने का काम जजों के पास ही रहना चाहिए। यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है, जब हर तरफ एआई की चर्चा है और कहा जा रहा है कि मशीनें अदालत चला लेंगी। सीजेआई ने इस भ्रम को तोड़ा है और कहा है कि टेक्नोलॉजी न्याय तक पहुंच आसान कर सकती है, लेकिन न्याय खुद नहीं बन सकती।
आज कहा जा रहा है कि एआई कोर्ट बनेंगे, जहां कंप्यूटर केस सुनेगा और तुरंत फैसला देगा। सुनने में यह बहुत आधुनिक लगता है। लंबित केस खत्म होंगे, तारीखों का चक्कर खत्म होगा, लेकिन क्या न्याय इतना आसान है? क्या एक मशीन समझ सकती है कि एक मां ने भूख से तड़पते बच्चे के लिए चोरी क्यों की? क्या वह समझ सकती है कि एक किसान ने कर्ज में डूबकर क्या दर्द झेला है? न्याय सिर्फ धारा और सबूत नहीं है। न्याय में मनुष्य का दर्द भी है और यह दर्द मशीन नहीं पढ़ सकती।
सीजेआई ने बहुत संतुलित बात कही है। उन्होंने कहा कि एआई का इस्तेमाल होना चाहिए, लेकिन एक सीमा में। एआई फाइलों को कंप्यूटर पर ला सकता है, पुराने फैसलों को खोज सकता है, अनुवाद कर सकता है और सुनवाई को लाइव कर सकता है। इससे ई-फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई, डिजिटल केस मैनेजमेंट और लाइव स्ट्रीमिंग जैसी सुविधाएं बढ़ी हैं और आम आदमी को अदालत तक पहुंचना आसान हुआ है। लेकिन अंतिम मुहर इंसान की ही होनी चाहिए, क्योंकि सजा का दर्द इंसान झेलता है, मशीन नहीं।
एआई पुराने डेटा से सीखता है। यदि पुराने डेटा में ही किसी समाज या वर्ग के प्रति भेदभाव है तो एआई उसी भेदभाव को आगे बढ़ाएगा। दुनिया के कई देशों में ऐसा हो चुका है, जहां एआई ने गरीब तबके के लिए कठोर सजा की सिफारिश की और अमीर तबके के लिए नरम रुख अपनाया। भारत जैसे देश में, जहां सैकड़ों भाषाएं, जातियां और परंपराएं हैं, वहां मशीन का फैसला और भी खतरनाक हो सकता है। कानून की किताब एक है, लेकिन उसकी व्याख्या हर केस में अलग है। यह व्याख्या विवेक मांगती है और विवेक आज भी इंसान के पास ही है।
इस बात से इनकार नहीं कि भारत में न्याय व्यवस्था के डिजिटल बदलाव ने लोगों को राहत दी है। पहले फाइलों के बोझ में केस दब जाते थे, अब कंप्यूटर पर केस ट्रैक होता है। पहले दूर-दराज के गांव के व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट आने में हजारों रुपये खर्च करने पड़ते थे, अब वह वर्चुअल रूप से जुड़ जाता है। लाइव स्ट्रीमिंग से पारदर्शिता आई है। इससे अदालतों पर भरोसा बढ़ा है। लेकिन यह बदलाव तभी तक सुंदर है, जब तक वह इंसान को केंद्र में रखे।
जज सिर्फ फैसला नहीं सुनाता, वह भरोसा भी देता है। जब कोई पीड़ित अदालत में खड़ा होता है तो वह जज की आंखों में न्याय खोजता है। वह देखना चाहता है कि उसकी बात सुनी जा रही है। मशीन की स्क्रीन में वह भरोसा नहीं मिलेगा। न्याय का मानवीय चेहरा जरूरी है और वही चेहरा अदालत को मंदिर बनाता है। यदि वह चेहरा हटा दिया गया तो अदालत सिर्फ एक सॉफ्टवेयर बनकर रह जाएगी।
रास्ता टकराव का नहीं, सहयोग का होना चाहिए। एआई को अदालत का क्लर्क बनाइए, निर्णायक नहीं। उसे ऐसा सहायक बनाइए, जो रात भर जागकर फाइल पढ़े, लेकिन फैसला सुबह जज ही लिखे। सरकार को चाहिए कि वह जजों को तकनीक की ट्रेनिंग दे, गांव-गांव तक इंटरनेट पहुंचाए और अदालतों में बुनियादी सुविधाएं बढ़ाए, लेकिन एआई को जज बनाने की जल्दबाजी न करे। सीजेआई सूर्यकांत का संदेश बहुत स्पष्ट है। टेक्नोलॉजी बढ़ाने के लिए है, घटाने के लिए नहीं। वह न्याय को तेज कर सकती है, लेकिन न्याय की आत्मा नहीं बन सकती। आत्मा आज भी काले कोट वाले उस इंसान में ही बसती है, जो सबूतों के बीच सच को खोजता है और सच के साथ खड़ा होता है।














