खड़गपुर, 06 अक्टूबर।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नवीनतम और महत्वपूर्ण अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि अम्फान जैसे भीषण चक्रवातों और गंभीर मौसम प्रणालियों का असर केवल सतही पानी या समुद्र तट तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह धरती की सतह से 100 मीटर से भी अधिक गहराई में मौजूद भूजल प्रणालियों को गहराई से प्रभावित कर सकता है। प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, सुंदरबन जैसे संवेदनशील गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना डेल्टा क्षेत्र में चरम जलवायु घटनाओं के दौरान भूजल के स्तर और उसकी रासायनिक बनावट में भारी उथल-पुथल देखने को मिलती है। आईआईटी खड़गपुर के विशेषज्ञ दल द्वारा मई 2017 से मई 2020 के बीच आए कुल 11 चक्रवातों और निम्न दबाव प्रणालियों (जिनमें तितली, फानी, बुलबुल और अम्फान शामिल हैं) के विश्लेषण से यह बात सामने आई है कि ऐसे शक्तिशाली तूफान मीठे और खारे पानी के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ सकते हैं, जिससे भविष्य में तटीय क्षेत्रों में पेयजल सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि भूजल प्रणालियों पर इन तूफानों का प्रभाव उनकी गहराई के अनुसार भिन्न-भिन्न रूप से पड़ता है, जहां उथले जलभृतों में बदलाव तुरंत और स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, वहीं गहरे जलभृतों पर इसके परिणाम लंबे समय तक बने रह सकते हैं। चूंकि सुंदरबन क्षेत्र पहले से ही बढ़ते समुद्री जल स्तर, लवणीकरण और भूजल में आर्सेनिक जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, ऐसे में चक्रवातों के कारण होने वाला यह अतिरिक्त दबाव भूजल संसाधनों को और अधिक असुरक्षित बना देता है। इस अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों ने तटीय भूजल प्रणालियों को एक समान मानने की बजाय गहराई के आधार पर अलग-अलग और उन्नत प्रबंधन नीतियां तैयार करने पर जोर दिया है। उनका सुझाव है कि यदि तटीय आबादी को स्वच्छ पेयजल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करनी है, तो भूजल दोहन को नियंत्रित करने, गहरे जलभृतों का संरक्षण करने और जलवायु परिवर्तन की योजनाओं में भूजल सुरक्षा को प्राथमिकता देने की तत्काल आवश्यकता है। 














