नई दिल्ली, 14 मई।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कई महत्वपूर्ण और तीखे सवाल किए हैं। अदालत ने यह जानना चाहा कि यदि अंतिम निर्णय सरकार के ही हाथों में रहना है तो चयन समिति में विपक्ष के नेता को शामिल करने का उद्देश्य क्या है।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि यदि प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता अलग-अलग नाम प्रस्तावित करते हैं तो तीसरे सदस्य का निर्णय किस आधार पर और किसके पक्ष में माना जाएगा। अदालत ने इस व्यवस्था को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि पूरी प्रक्रिया कार्यपालिका के नियंत्रण में दिखाई देती है।
यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वर्तमान व्यवस्था से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है और इसकी निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से इस पूरी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और संतुलन को लेकर विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता अत्यंत महत्वपूर्ण है।




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