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10 Apr, 2026

वरिष्ठ लेखक एस. आर. रामास्वामी का निधन, साहित्य जगत में शोक की लहर

वरिष्ठ लेखक और विद्वान एस. आर. रामास्वामी के निधन से कन्नड़ साहित्य और पत्रकारिता जगत को गहरा आघात पहुँचा है, उनके योगदान को याद करते हुए पूरे क्षेत्र में शोक की लहर है।

बेंगलुरु, 10 अप्रैल 2026।

वरिष्ठ विद्वान, लेखक, नाडोज और राष्ट्रोत्थान परिषद के पूर्व अध्यक्ष एस. आर. रामास्वामी (88 वर्ष) का शुक्रवार सुबह बेंगलुरु स्थित शंकरपुरम के रंगराव रोड पर उनके आवास पर निधन हो गया, जिससे कन्नड़ साहित्य और पत्रकारिता जगत को गहरा आघात पहुँचा है।

उनके निधन के बाद उनका पार्थिव शरीर आज दोपहर 12 बजे तक केंपेगौड़नगर स्थित राष्ट्रोत्थान परिषद के केशवशिल्प में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया है, जिसके उपरांत उनका अंतिम संस्कार रुद्रभूमि में संपन्न किया जाएगा।

उनके निधन पर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा, विपक्ष के नेता आर. अशोक तथा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विजयेंद्र सहित अनेक प्रमुख व्यक्तियों ने शोक व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है।

डॉ. रामास्वामी ने अपने जीवन के पाँच दशकों से अधिक समय तक पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। वे पिछले 35 वर्षों से ‘उत्थान’ मासिक पत्रिका तथा ‘राष्ट्रोत्थान साहित्य’ प्रकाशन के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत थे, जबकि वर्ष 1972 से 1979 तक उन्होंने ‘सुधा’ साप्ताहिक में मुख्य उपसंपादक के रूप में भी कार्य किया।

साहित्यिक क्षेत्र में उन्होंने सुभाष चंद्र बोस, जयप्रकाश नारायण, वल्लभभाई पटेल और मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया जैसे महान व्यक्तित्वों की जीवनियां लिखकर महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने लगभग 55 ग्रंथों की रचना की, जिनमें ‘भारत में समाजकार्य’, ‘स्वतंत्रोदय के मील के पत्थर’, ‘आर्थिकता के दो ध्रुव’ और ‘शताब्दी के मोड़ पर भारत’ जैसी कृतियां शामिल हैं।

उनकी पुस्तक ‘शताब्दी के मोड़ पर भारत’ को कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने धर्मपाल के ग्रंथों का कन्नड़ भाषा में अनुवाद कर भारतीय चिंतन को नई दिशा प्रदान की।

उन्होंने ‘दीवटिगेगलु’, ‘सभ्यताओं का संघर्ष’, ‘कुछ ऐतिहासिक पर्व’ और ‘दीप्तिमंत’ जैसी कृतियों के माध्यम से समाज, इतिहास और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं का गहन विश्लेषण किया। उन्होंने 1000 से अधिक शोधपरक लेख लिखकर समाजोन्मुख विचारों को व्यापक रूप से प्रसारित किया।

पत्रकारिता और साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें ‘आर्यभट्ट पुरस्कार’, कर्नाटक राज्य पुरस्कार, कर्नाटक मुक्त विश्वविद्यालय की ओर से मानद डॉक्टरेट तथा मिथिक सोसाइटी शताब्दी पुरस्कार सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए। वर्ष 2015 में कन्नड़ विश्वविद्यालय, हम्पी द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित ‘नाडोज’ उपाधि से भी सम्मानित किया गया था।

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