मध्य प्रदेश
01 May, 2026

अमरकंटक में बैसाखी पूर्णिमा पर आस्था का सैलाब, नर्मदा में स्नान कर श्रद्धालुओं ने किया पूजन

अमरकंटक में बैसाखी पूर्णिमा पर नर्मदा स्नान, मंदिर पूजा, धार्मिक अनुष्ठान और भव्य आयोजनों के बीच श्रद्धा और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूब गया।

अनूपपुर, 01 मई

अमरकंटक स्थित मां नर्मदा के उद्गम स्थल पर शुक्रवार को बैसाखी पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धा और आस्था का विशाल दृश्य देखने को मिला। इस पावन अवसर पर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने नर्मदा नदी में डुबकी लगाकर पुण्य अर्जित किया और कोटि तीर्थ घाट, रामघाट तथा संगम तट सहित विभिन्न घाटों पर स्नान किया।

एक माह से चल रहे बैसाखी स्नान मेले का भी इसी दिन समापन हो गया। सुबह लगभग पांच बजे से ही श्रद्धालुओं की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी, जो देर शाम तक लगातार बनी रही। स्नान के बाद भक्तों ने मां नर्मदा मंदिर में पहुंचकर विधिवत दर्शन और पूजा-अर्चना की। इस दौरान श्रद्धालुओं ने अपनी आस्था के अनुसार गरीबों को भोजन, वस्त्र और फल का दान भी किया। पूरे मंदिर परिसर में जयकारों की गूंज वातावरण को भक्तिमय बनाती रही।

गुरुवार रात हुई तेज आंधी और बारिश के कारण मौसम में बदलाव आया, जिससे तापमान में गिरावट दर्ज की गई और श्रद्धालुओं को गर्मी से राहत मिली। सुहावने मौसम में भक्तों का उत्साह और अधिक बढ़ गया, हालांकि व्यापारियों को अपेक्षाकृत कम भीड़ के कारण निराशा का सामना करना पड़ा। स्थानीय दुकानदारों के अनुसार पिछले वर्षों की तुलना में इस बार भीषण गर्मी के कारण पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की संख्या कम रही, जिससे व्यापार पर असर पड़ा।

इसी पावन अवसर पर मृत्युंजय आश्रम में आयोजित सप्त दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन विशाल भंडारे के साथ किया गया। पूरे आयोजन की व्यवस्था आश्रम प्रबंधन द्वारा सुव्यवस्थित रूप से की गई, जिससे कार्यक्रम शांतिपूर्ण और सफल रहा। इस धार्मिक आयोजन ने क्षेत्र की आध्यात्मिक परंपरा को और अधिक सशक्त किया।

वहीं श्री कल्याण सेवा आश्रम में वैशाख पूर्णिमा के अवसर पर धर्म ध्वजा का वैदिक विधि-विधान से पूजन और अभिषेक संपन्न हुआ। प्रातःकाल से ही आश्रम में भक्तिमय वातावरण बना रहा और संत-महात्माओं के सानिध्य में ध्वजा वंदना की गई। परंपरा अनुसार पुरानी ध्वजा को हटाकर नई ध्वजा स्थापित की गई, जिसे नवचेतना और आस्था का प्रतीक माना जाता है।

आश्रम प्रबंधन ने बताया कि यह परंपरा वर्ष में दो बार शारदीय नवरात्रि और वैशाख पूर्णिमा पर निभाई जाती है। इस अवसर पर अनेक संत-महात्मा और विद्वान आचार्यों की उपस्थिति ने आयोजन को और भी गरिमामयी बना दिया। पूरे आयोजन ने क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान की।

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