मप्र में पारा 44-45 डिग्री के पार जा रहा है और सरकारी स्कूलों की प्यास बुझाने का दावा करने वाला जल जीवन मिशन दम तोड़ रहा है। गर्मी के कारण जब आम लोगों के कंठ सूख रहे हैं, तो ऐसे में मप्र के सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों की स्थिति क्या होगी, अंदाजा लगाया सकता है। हालात यह हैं कि प्रदेश के 17488 स्कूलों में पेयजल के कोई इंतजाम नहीं है। बच्चे या तो घर से बोतल में पीने का पानी लेकर स्कूल जा रहे हैं, या नगर-गांव के हैंडपंप पर जाकर अपनी प्यास बुझा रहे हैं।जानकारी के अनुसार जल जीवन मिशन के तहत प्रदेश के 93419 सरकारी स्कूलों में नल के जरिए शुद्ध पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य था। लेकिन प्रशासनिक सुस्ती का आलम यह है कि अब तक केवल 75931 स्कूलों में पेयजल की व्यवस्था हो पाई है। जबकि 17488 स्कूल आज भी भी इस बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहे हैं। शौचालयों में पानी की हालत भी खराब है। प्रदेश में मात्र 63066 स्कूलों के शौचालय में ही पानी की आपूर्ति हो पा रही है। हाथ धोने की व्यवस्था 82245 स्कूलों में ही उपलब्ध है। जल जीवन मिशन में शामिल प्रदेश के 52 में से केवल 13 जिलों ने ही अपना शत-प्रतिशत लक्ष्य प्राप्त किया है। टॉप-5 जिलों में निवाड़ी (506), भोपाल (637), बुरहानपुर (640), हरदा (692) और आगर (753) शामिल हैं। इसके उलट 39 जिले अब भी पीछे हैं।ढांचा तैयार, टोंटियां गायबजन जीवन मिशन के तहत स्कूलों में पानी पहुंचाने के दावों की हकीकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रायसेन के सांची ब्लॉक के भैंसाया के शासकीय प्राथमिक शाला में पानी के लिए बनाए गए ढांचे तो दिखे, लेकिन उनमें लगी टोंटियां गायब हैं। यहां सिर्फ पुरानी व्यवस्था के अवशेष बचे हैं। न तो स्कूल की छत पर टंकी है और न ही परिसर में। बच्चों की उम्मीदों का एकमात्र सहारा हैंडपंप भी जर्जर और खराब पड़ा है। विदिशा के तोपपुरा प्राथमिक शाला में मिशन अब तक नहीं पहुंच सका। योजना के नाम पर बना ढांचा अब पूरी तरह जर्जर हो चुका है। पेयजल के लिए छात्र हैंडपंप पर निर्भर हैं। शौचालय में पानी का नामोनिशान नहीं है। यही बदहाली जिले के शासकीय प्राथमिक शाला जतरापुरा में भी साफ दिखाई देती है। गुना के मातापुरा शासकीय प्राथमिक विद्यालय में भी नल से जल का सपना दिखावटी है। यहां बना ढांचा जर्जर है और टॉटियों का कोई अता-पता नहीं। पानी के अभाव में शौचालय बंद रहते हैं। हैंडपंप ही सहारा है। गोपालपुरा शासकीय प्राथमिक स्कूल में हैंडपंप खराब है। वहां शहर की टंकी से सप्लाई होती है, पर बिजली न होने पर पानी नहीं आता। आंगनबाड़ी में चोरी के डर से टंकी शौचालय के अंदर कैद मिली। यहां वॉश बेसिन में टोंटी होने के बावजूद पानी नदारद है।कई जिलों की स्थिति चिंताजनकजल जीवन मिशन की विफलता का सबसे बड़ा चेहरा राजगढ़ जिला है। यहां 1976 स्कूलों के लक्ष्य के विरुद्ध 1089 स्कूलों में काम हो सका है। जिले के करीब 887 स्कूलों (45 फीसदी) में नल से जल पहुंचाना शेष है। भिंड में 1888 के लक्ष्य के 831 स्कूल अब भी अधूरे हैं। छतरपुर की स्थिति भी चिंताजनक है। 2118 स्कूलों का लक्ष्य था। 882 स्कूलों में में मुकाबले काम शुरू नहीं हो पाया। मुरैना जिले में 1272 स्कूलों पानी पहुंच सका है। 784 स्कूलों तक जलापूर्ति बकाया है। बड़वानी के आंकड़े भी भयावह हैं। यहां 3042 स्कूलों का लक्ष्य था, लेकिन सुस्ती ऐसी है कि 1133 स्कूलों में योजना अब तक शुरू नहीं हो सकी है। इन पांचों जिलों के संयुक्त आंकड़े को देखें तो करीब 4517 स्कूलों में बुनियादी ढांचा तैयार नहीं हो सका है। भोपाल संभाग के सीहोर, रायसेन, विदिशा जिले को देखें तो सीहोर की प्रगति अच्छी है। जिले के 1469 स्कूलों के लक्ष्य के मुकाबले 1467 में कार्य पूर्ण है। महज 2 स्कूल शेष बचे हैं। विदिशा जिले की स्थिति दयनीय है। यहां 1998 स्कूलों का लक्ष्य होने के बावजूद 748 स्कूलों में काम शुरू नहीं हो सका है। रायसेन जिले की प्रगति भी कुछ खास नहीं। 1940 में से 494 स्कूलों में पानी की पाइपलाइन व टॉटियां लगाना बाकी हैं। ग्वालियर संभाग के अशोकनगर में 1209 में से 262 और गुना में 1769 के लक्ष्य में से 176 स्कूलों में काम अधूरा पड़ा है।








