संपादकीय
07 May, 2026

“अहंकार बनाम जवाबदेही : सत्ता के गलियारों में जनहित की दुर्दशा”

मध्य प्रदेश में प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच बढ़ते टकराव, जवाबदेही की कमी, पत्रों की अनदेखी, औपचारिक जवाब और अहंकारपूर्ण रवैये से जनहित के कार्य प्रभावित होने की स्थिति सामने आई है।

07 मई।
मध्य प्रदेश की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था इन दिनों एक अजीब किस्म के टकराव का अखाड़ा बन चुकी है, जहां जनसेवा पीछे छूट गई है और “मैं बड़ा कौन” की लड़ाई केंद्र में आ गई है। केंद्र सरकार को बार-बार मुख्य सचिव को चिट्ठी लिखकर यह याद दिलाना पड़े कि जनप्रतिनिधियों के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए, यह अपने आप में व्यवस्था की विफलता का खुला प्रमाण है। सवाल सीधा है, क्या अफसरशाही इतनी बेलगाम हो चुकी है कि उसे लोकतंत्र की बुनियादी मर्यादाएं भी याद दिलानी पड़ रही हैं।
सांसद और विधायक जनता द्वारा चुने जाते हैं। वे किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सर्वोच्च प्राथमिकता के हकदार होते हैं, क्योंकि वे जनता की आवाज हैं। लेकिन जब उनके पत्रों को कूड़ेदान में फेंकने जैसा व्यवहार हो, महीनों तक जवाब न मिले या जवाब देने का जिम्मा निचले स्तर के कर्मचारियों पर छोड़ दिया जाए, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति खुली अवमानना है। “कार्यवाही प्रचलन में है” जैसे खोखले जवाब अब प्रशासन की पहचान बनते जा रहे हैं। यह भाषा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से बचने का सुविधाजनक बहाना बन चुकी है।
लेकिन इस पूरी तस्वीर में जनप्रतिनिधि भी दूध के धुले नहीं हैं। अधिकारियों को धमकाना, सार्वजनिक रूप से अपमानित करना या निजी प्रभाव दिखाने की कोशिश करना भी उतना ही निंदनीय है। जब मंत्री से लेकर विधायक तक अपनी सीमाएं भूल जाते हैं, तो फिर अफसरों से शालीनता और जवाबदेही की उम्मीद करना भी बेमानी लगने लगता है। यह टकराव अब व्यवस्था सुधार का नहीं, बल्कि अहंकार की लड़ाई का प्रतीक बन चुका है।
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इस खींचतान में आम जनता पूरी तरह गायब हो गई है। जिन मुद्दों को लेकर सांसद और विधायक पत्र लिखते हैं, वे जनता की समस्याएं होती हैं। जब उन पत्रों पर कार्रवाई नहीं होती, तो विकास ठप पड़ता है, योजनाएं अधर में लटकती हैं और जनता का भरोसा धीरे-धीरे खत्म होता जाता है। प्रशासन और राजनीति के बीच यह खाई जितनी गहरी होगी, उसका नुकसान उतना ही आम नागरिक को उठाना पड़ेगा।
केंद्र सरकार का यह निर्देश कि सचिव स्तर के अधिकारी ही जवाब दें, एक जरूरी कदम जरूर है, लेकिन यह इलाज नहीं, केवल पट्टी है। असली बीमारी मानसिकता की है। अधिकारियों को अपनी जवाबदेही समझनी होगी और जनप्रतिनिधियों को अपनी मर्यादा। दोनों पक्षों को यह समझना होगा कि वे एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही व्यवस्था के पूरक हैं।
मध्य प्रदेश में लगातार बढ़ती शिकायतें इस बात का संकेत हैं कि अब केवल चेतावनी के शब्दों से काम नहीं चलेगा। सख्ती, जवाबदेही और पारदर्शिता को व्यवहार में लागू करना होगा। वरना हालात जल्द ही उस स्तर पर पहुंच जाएंगे, जहां न प्रोटोकॉल का कोई अर्थ बचेगा और न पद का सम्मान।
अगर अभी भी व्यवस्था नहीं चेती, तो यह टकराव केवल चिट्ठियों तक सीमित नहीं रहेगा। यह लोकतांत्रिक ढांचे की जड़ों को कमजोर कर देगा। और जब व्यवस्था कमजोर होती है, तो सबसे पहले और सबसे ज्यादा नुकसान उसी जनता का होता है, जिसके नाम पर यह पूरी सत्ता टिकी हुई है। 
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