ग्वालियर, 01 मई।
ग्वालियर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के प्राचार्य चयन को लेकर ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थानों को अपने प्राचार्य या प्रभारी प्राचार्य के चयन का पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, और राज्य सरकार उन पर वरिष्ठता आधारित नियम अनिवार्य रूप से लागू नहीं कर सकती।
न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी शिक्षण संस्थान में प्राचार्य का पद अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, जो संस्थान के अनुशासन, प्रशासन और शैक्षणिक गुणवत्ता को प्रभावित करता है। इस कारण संस्थान को अपनी आवश्यकता और योग्यता के आधार पर स्वतंत्र रूप से नेतृत्व का चयन करने का अधिकार होना चाहिए, भले ही चयनित व्यक्ति वरिष्ठतम न हो।
न्यायालय ने 25 अगस्त 2021 और 8 सितंबर 2021 को जारी उन सरकारी आदेशों को निरस्त कर दिया, जिनमें यह प्रावधान था कि प्रभारी प्राचार्य के रूप में केवल वरिष्ठतम शिक्षक की नियुक्ति की जाए। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि एक बार प्रबंधन द्वारा योग्य व्यक्ति का चयन कर लेने के बाद, उसकी उपयुक्तता में सरकार या न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
यह मामला विदिशा स्थित एक महाविद्यालय से शुरू हुआ था, जहां प्रबंधन ने एक शिक्षक को प्रभारी प्राचार्य नियुक्त किया था, लेकिन विभागीय आदेश के तहत वरिष्ठ शिक्षक को यह दायित्व सौंपने का निर्देश दिया गया था। इस निर्णय के खिलाफ प्रबंधन ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।
प्रारंभिक सुनवाई में एकल पीठ ने सरकार के पक्ष में निर्णय दिया था, लेकिन अब खंडपीठ ने उसे निरस्त करते हुए संस्थान के अधिकारों को बरकरार रखा है। इस फैसले को शिक्षा क्षेत्र में संस्थागत स्वायत्तता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।









