जबलपुर, 02 नवंबर।
जबलपुर के संजीवनी नगर में जो प्रयोग हुआ है, वह देश की शिक्षा व्यवस्था में मील का पत्थर है। एक ही इमारत में एक तरफ संस्कार भारती नाम का स्कूल और दूसरी तरफ संस्कार उतारती शराब की दुकान चल रही है। हाईकोर्ट ने पूछा है कि जबलपुर में एक ही इमारत में शाला और मधुशाला कैसे चल रही हैं? सवाल तो अदालत पूछ रही है, लेकिन हमें तो इसमें सरकार की दूरदर्शिता दिखाई देती है। सरकार ने तय किया है कि समय की बर्बादी नहीं होनी चाहिए। बच्चा सुबह पहाड़ा पढ़े और शाम को उसके पिता उसी परिसर में पैग लगाएं। यह है समय प्रबंधन का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण। बच्चा बोले, ए फॉर एप्पल या ए फॉर अल्कोहल?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी बात सरकारी विभागों का अद्भुत तालमेल है। आबकारी विभाग कहता है कि हमने लाइसेंस दिया है, तो क्या हुआ? शिक्षा विभाग कहता है कि हमने मान्यता दी है, तो क्या हुआ? कलेक्टर कार्यालय कहता है कि शिकायत आई, तो क्या हुआ? नगर निगम कहता है कि नक्शा पास है, तो क्या हुआ? सभी विभाग अपनी-अपनी आंखें बंद किए बैठे हैं और इसी को कहते हैं सुशासन का टीमवर्क। किसी ने नहीं सोचा कि शराब की दुकान और स्कूल एक साथ कैसे चल सकते हैं, क्योंकि सोचने के लिए समय चाहिए और समय फाइलें दबाने में लगा है। एक नागरिक अजय पटेल ने कलेक्टर और आबकारी अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। आखिरकार हाईकोर्ट जाना पड़ा। आम आदमी को न्याय के लिए अदालत जाना पड़े और सरकारी अधिकारी अपनी कुर्सियों पर बैठकर चाय पीते रहें, यही तो व्यवस्था है!
सरकार की नीति कहती है कि स्कूल, मंदिर और अस्पताल के पास शराब की दुकान नहीं होनी चाहिए, लेकिन नीति में यह नहीं लिखा कि एक ही इमारत में दुकान नहीं हो सकती। लिहाजा, बाबुओं ने इस छेद का पूरा फायदा उठा लिया। इमारत के दो हिस्से कर दिए, एक में स्कूल और दूसरे में दुकान। फिर कह दिया कि देखिए, दूरी तो है ही, कम से कम एक दीवार की दूरी! यह कैसा तर्क है? जैसे कोई कहे कि शेर और बकरी एक ही पिंजरे में हैं, लेकिन बीच में रस्सी बंधी है, इसलिए दोनों सुरक्षित हैं। नीति बनाने वाले बड़े साहब वातानुकूलित कमरों में बैठकर नियम बनाते हैं और उन्हें लागू करने वाले छोटे साहब उन्हीं नियमों में से रास्ता निकाल लेते हैं।
सोचिए, उस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों पर इसका क्या असर पड़ता होगा। सुबह प्रार्थना में बच्चा कहता है, 'हमको मन की शक्ति देना' और दोपहर में देखता है कि बाहर लोग मन की शांति के लिए बोतल खोल रहे हैं। शिक्षक ब्लैकबोर्ड पर लिखता है कि शराब हानिकारक है और खिड़की से दिखता है कि उसी परिसर में शराब बिक रही है। बच्चा उलझन में पड़ जाएगा कि किताब सही है या खिड़की से दिखाई देने वाला दृश्य। लेकिन यही तो नई व्यावहारिक शिक्षा है, किताबी ज्ञान एक तरफ और जीवन का सच दूसरी तरफ!
सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि जनहित याचिका दायर करने वाले व्यक्ति को ही संघर्ष करना पड़ा। पहले कलेक्टर के पास जाओ, फिर आबकारी विभाग के पास और जब कोई न सुने, तो हाईकोर्ट जाओ। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने नोटिस जारी कर राज्य सरकार से जवाब मांगा है और कलेक्टर को लंबित आवेदन पर निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। अब कलेक्टर कार्यालय में फाइल खोजी जाएगी कि आवेदन कहां रखा है। संभव है, वह किसी अलमारी में चाय के दाग के नीचे दबा हो।
आजकल हर चीज में कॉम्बो का चलन है। शॉपिंग मॉल में एक ही छत के नीचे सिनेमा और खाना मिलता है, तो जबलपुर में एक ही छत के नीचे शिक्षा और नशा भी उपलब्ध है। सुबह बच्चा ज्ञान लेने आए और शाम को पिता तनाव भगाने। परिवार का पूरा पैकेज एक ही जगह! सरकार को इस मॉडल का विस्तार करने पर विचार करना चाहिए, क्योंकि शिक्षा से राजस्व नहीं आता, लेकिन शराब से खूब आता है। राजस्व का यह प्रेम भी समझ में आता है।
हाईकोर्ट का सवाल केवल जबलपुर का नहीं, पूरे सिस्टम का है। क्या हमारी नीतियां इतनी कमजोर हैं कि एक दीवार के इस पार स्कूल और उस पार शराब की दुकान को चलने दिया जाए? क्या अधिकारी आंखों देखी अनदेखी करते रहेंगे? क्या हम बच्चों के भविष्य के बगल में नशे की दुकान देखकर भी चुप रहेंगे? जबलपुर की इस घटना ने नीतियों की खामियों और विभागों की लापरवाही को उजागर कर दिया है। अब देखना है कि सरकार क्या जवाब देती है। क्या वह गलती स्वीकार करेगी या कोई नया नियम निकालकर कहेगी कि एक ही परिसर में शाला और मधुशाला से संस्कार और साक्षरता, दोनों मिल रहे हैं?















