भोपाल, 02 नवंबर।
त्योहारों पर क्या हम अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का पालन करेंगे? वोकल फॉर लोकल को प्राथमिकता देते हुए हम त्योहारों में देशी उत्पाद खरीदें, न कि विदेशी। प्रधानमंत्री ने अपने चर्चित कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 139वें एपिसोड में कहा कि देश में वोकल फॉर लोकल की भावना मजबूत हो रही है। बाजारों में स्वदेशी उत्पादों की रौनक दिखाई दे रही है। देश के हर हिस्से में लोग चमक-दमक वाले चीनी उत्पादों के बजाय स्वदेशी सामान को प्राथमिकता देने लगे हैं। मिट्टी, जूट, गोबर, कागज और फूलों से बने सजावटी उत्पाद खूब पसंद किए जा रहे हैं। स्थानीय कलाकारों द्वारा बनाए गए सजावटी सामान बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी का मन मोह रहे हैं।
दीपोत्सव पर परंपरागत रूप से मिट्टी के दीये जलाने की रीति रही है। दिखावटी चमक-दमक की जगह अब लोगों में प्रकृति को संजोने वाली परंपराओं की ओर लौटने का रुझान भी स्पष्ट दिखाई देता है। अपने देश में बने सामान के साथ उत्सव मनाने के प्रति गर्व का भाव भी बढ़ रहा है। बीते कुछ वर्षों में सरकार ने वोकल फॉर लोकल की मुहिम को बल देने की दिशा में काम किया है। देश को आत्मनिर्भर बनाने की इस राह में सरकार के प्रयासों को आमजन का सहज साथ भी मिला है। प्रधानमंत्री ने स्थानीय कारीगरों के उत्पादों को प्राथमिकता देने की अपील करते हुए कहा है कि इससे उनकी मेहनत को प्रोत्साहन मिलेगा।
दीपावली पर घर की साज-सज्जा से लेकर खानपान और पहनावे तक, हर तरह के सामान की खरीदारी बढ़ जाती है। ऐसे में गांवों, कस्बों और शहरों में स्वदेशी उत्पादों की खरीदारी कारीगरों, व्यवसायियों और पारंपरिक कला को सहेजने वालों के जीवन में भी उजाला लाती है। वोकल फॉर लोकल की सोच अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ देश की अर्थव्यवस्था को संवारने वाली भी है। इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से नवाचार तथा रोजगार को बढ़ावा मिलता है। इस वर्ष गांधी जयंती पर एक ही दिन में खादी ग्रामोद्योग के उत्पादों की करीब 28 करोड़ रुपये से अधिक की बिक्री हुई। बीते साल की तुलना में यह करीब डेढ़ करोड़ रुपये अधिक है। इस खरीद का लाभ खादी, हस्तशिल्प और दूसरे उत्पाद तैयार करने वाले कारीगरों तक भी पहुंचता है।
हालांकि, यह सब पढ़कर अच्छा लगता है, लेकिन सवाल है कि क्या केवल प्रधानमंत्री की अपील से यह बदलाव आ जाएगा? अपील का असर तभी होता है, जब अपील करने वाला खुद उस पर अमल करता दिखाई दे। यदि मंच से स्वदेशी खरीदने की बात कही जाए और व्यवहार में विदेशी सामान का उपयोग हो, तो जनता भ्रमित होती है। जनता भाषण नहीं, आचरण देखती है। इसलिए अपील करने वालों को भी देशी उत्पाद खरीदकर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। सांसद, विधायक, पार्षद और अधिकारी यदि खुद मिट्टी के दीये, कुम्हार के बनाए सजावटी सामान, खादी के कपड़े और स्थानीय मिठाइयां खरीदते दिखाई दें, तो संदेश अपने आप घर-घर पहुंचेगा। यह खरीद केवल तस्वीर खिंचवाने के लिए नहीं, बल्कि वास्तविक समर्थन के लिए होनी चाहिए।
बाजार में आज भी विदेशी सामान सस्ता और चमकदार दिखाई देता है। प्लास्टिक की झालर मिट्टी के दीये से सस्ती लग सकती है, लेकिन इसकी कीमत पर्यावरण और स्थानीय कारीगर चुकाते हैं। ग्राहक को लगता है कि वह पैसा बचा रहा है, लेकिन इससे देश का पैसा बाहर जाता है। स्थानीय उत्पादों में हाथों की मेहनत, समय और हुनर शामिल होता है। यदि हम केवल कीमत देखेंगे, तो स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना मुश्किल होगा। लेकिन यदि हम यह समझें कि कितने परिवारों को रोजगार मिलता है और कितनी पारंपरिक कलाएं बचती हैं, तो स्वदेशी उत्पादों का महत्व स्पष्ट हो जाएगा।
दीपावली से महीनों पहले कुम्हार चाक चलाता है। उसकी पत्नी दीये सुखाती है और बच्चे उन्हें रंगते हैं। पूरा परिवार उम्मीद करता है कि इस बार अच्छी बिक्री होगी और बच्चों के लिए नए कपड़े आएंगे। लेकिन त्योहार से पहले बाजार में विदेशी झालरें आ जाती हैं, ग्राहक उनकी ओर आकर्षित होता है और कुम्हार के दीये कोने में पड़े रह जाते हैं। यही स्थिति बांस के टोकरे बनाने वालों, दर्जियों, मोचियों और हलवाइयों की भी है। उनके उत्पादों में हुनर और परंपरा है, लेकिन बाजार में चमक-दमक का शोर अधिक है। वोकल फॉर लोकल का अर्थ है इस शोर के बीच स्थानीय कारीगरों की आवाज बनना और उनके उत्पादों को अपने घर का हिस्सा बनाना। यह दया नहीं, उनके श्रम का सम्मान है।
प्रधानमंत्री की अपील का पालन तभी प्रभावी होगा, जब ऊपर से नीचे तक एक समान प्रयास दिखाई देगा। स्कूलों में बच्चों को स्थानीय कारीगरों के काम से परिचित कराया जाए। कॉलेजों में युवा हस्तशिल्प को उपहार के रूप में देने का संकल्प लें और कार्यालयों में स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दी जाए। अपील को अभियान और अभियान को आदत बनाना होगा।
वोकल फॉर लोकल का अर्थ विदेशी उत्पादों से नफरत करना नहीं, बल्कि अपने लोगों और उनके हुनर से प्रेम करना है। जब हम स्थानीय उत्पाद खरीदते हैं, तो पैसा गांवों, कस्बों और शहरों में रहता है। दीपावली अंधेरे से उजाले की ओर जाने का त्योहार है। क्यों न इस बार उजाला अपने कुम्हार के दीये से करें, मिठास स्थानीय हलवाई की दुकान से लाएं और सजावट अपने ही देश के कारीगरों के उत्पादों से करें? यही वास्तविक आत्मनिर्भरता है।
त्योहारों पर वोकल फॉर लोकल केवल नारा नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और संस्कृति से जुड़ा संकल्प है। यह संकल्प तभी सार्थक होगा, जब अपील के साथ आचरण भी हो और कथनी-करनी में अंतर न रहे। इस दीपावली यदि हर घर में कम से कम एक ऐसा सामान पहुंचे, जिसे स्थानीय कारीगर ने बनाया हो, तो समझिए कि प्रधानमंत्री की अपील सार्थक हुई और देश का त्योहार सच में देश का त्योहार बना।















