लखनऊ, 02 नवंबर।
उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन अब ये समीकरण बदल रहे हैं। पहले कहा जाता था कि जिसकी जाति, उसकी सत्ता। अब कहा जा रहा है कि जिसकी भागीदारी, उसकी सत्ता। हर राजनीतिक दल समझ गया है कि केवल एक या दो जातियों के भरोसे सरकार नहीं बनाई जा सकती। इसलिए सभी दल नए सामाजिक गठजोड़ की तलाश में हैं। भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस, सभी अपने-अपने तराजू पर समाज को तौल रहे हैं और हर दल का दावा है कि उसका तराजू सबसे संतुलित है।
भाजपा के पास इस समय सबसे मजबूत संगठन है। उसने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों को लाभार्थी योजनाओं के जरिये जोड़ने की कोशिश की है। उज्ज्वला, आवास, शौचालय और राशन जैसी योजनाओं के कारण एक बड़ा वर्ग भाजपा के साथ खड़ा दिखाई देता है। लेकिन अब इस वर्ग में भी सवाल उठ रहे हैं कि योजनाओं का लाभ तो मिला, पर राजनीतिक हिस्सेदारी कहां है? टिकटों में हिस्सेदारी नहीं मिली, मंत्रिमंडल में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला। इसलिए भाजपा नए चेहरों को आगे कर रही है, छोटे समाजों के सम्मेलन आयोजित कर रही है और सबको साथ लेकर चलने का संदेश दे रही है। उसे भी आशंका है कि यदि यह वर्ग उससे दूर हुआ, तो सत्ता का समीकरण बिगड़ सकता है।
समाजवादी पार्टी ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए का नारा दिया है। अब इस सामाजिक आधार को और व्यापक बनाने की कोशिश हो रही है। इसमें गैर-यादव पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलितों को विशेष रूप से जोड़ने पर जोर है। शाक्य, सैनी, प्रजापति, कुशवाहा, मौर्य, बिंद, निषाद, पासी, वाल्मीकि और खटीक जैसे समाज संख्या में बड़े हैं, लेकिन राजनीतिक सत्ता में उनकी हिस्सेदारी सीमित रही है। सपा इन समाजों को उनकी संख्या के अनुरूप भागीदारी देने का संदेश दे रही है। इसके लिए अलग-अलग जिलों में प्रभाव रखने वाले नेताओं को आगे लाया जा रहा है। यह प्रयोग नया है और इसमें जोखिम भी है।
बहुजन समाज पार्टी लंबे समय से अपेक्षाकृत शांत दिखाई दे रही है, लेकिन उसकी अपनी रणनीति है। मायावती जानती हैं कि बसपा का मूल आधार जाटव समाज है, लेकिन केवल इसी आधार पर सत्ता हासिल करना कठिन है। इसलिए सर्वजन की राजनीति और ब्राह्मण-दलित गठजोड़ की पुरानी रणनीति को नए रूप में सामने लाने की कोशिश हो सकती है। बसपा उन वर्गों पर भी नजर रख रही है, जो भाजपा और सपा से असंतुष्ट हैं। इनमें गैर-जाटव दलित और भाजपा में उपेक्षित महसूस करने वाले ब्राह्मण शामिल हो सकते हैं। पार्टी के सामने चुनौती अपने संगठन को सक्रिय और मजबूत बनाए रखने की है।
कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में नए सामाजिक समीकरण तलाश रही है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जातीय जनगणना तथा हिस्सेदारी के मुद्दे उठा रहे हैं। कांग्रेस का ‘जितनी आबादी, उतना हक’ का नारा छोटे समाजों को आकर्षित करने की कोशिश है। पार्टी उन जातियों को भी जोड़ना चाहती है, जो उससे दूर हो गई थीं। हालांकि, जमीनी संगठन की कमजोरी उसके सामने बड़ी चुनौती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट, मुस्लिम और अति पिछड़े वर्गों के समीकरण महत्वपूर्ण हैं। मध्य उत्तर प्रदेश में कुर्मी, शाक्य और लोधी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। पूर्वांचल में बिंद, निषाद, राजभर, पासी, ब्राह्मण और ठाकुर समाजों की भूमिका अहम है, जबकि बुंदेलखंड में लोधी, कुशवाहा और दलित मतदाता प्रभाव डाल सकते हैं। हर क्षेत्र की सामाजिक परिस्थितियां अलग हैं और राजनीतिक दल उसी के अनुसार अपनी रणनीति बना रहे हैं।
आज दल-बदल भी राजनीति का अहम हिस्सा बन गया है। नेता एक दल से दूसरे दल में जा रहे हैं। हर पार्टी को लगता है कि दूसरे दल के नेता को शामिल करने से उसके समाज का वोट मिल जाएगा, लेकिन मतदाता अब इस खेल को समझने लगा है। वह केवल नेता का झंडा नहीं, उसका काम और समाज के प्रति योगदान भी देखता है।
विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। भाजपा का जोर हिंदुत्व और लाभार्थी वर्ग पर है, सपा पीडीए के सहारे आगे बढ़ना चाहती है, बसपा अपने पारंपरिक आधार के साथ सर्वजन की संभावनाएं तलाश रही है और कांग्रेस हिस्सेदारी के मुद्दे पर समर्थन जुटाना चाहती है। हालांकि, अंतिम फैसला जनता के हाथ में है। वह देख रही है कि कौन-सा दल केवल वादे कर रहा है और कौन वास्तव में राजनीतिक भागीदारी दे रहा है।
सवाल यह भी है कि क्या इन नए समीकरणों से जनता का भला होगा? क्या गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों को वास्तव में सम्मान, टिकट और सत्ता में भागीदारी मिलेगी, या उन्हें केवल वोट बैंक बनाकर इस्तेमाल किया जाएगा? यदि भागीदारी केवल चुनावी नारा बनकर रह गई, तो यह नया समीकरण भी पुराने समीकरणों की तरह टूट सकता है। राजनीति में चेहरे बदलने से नहीं, सोच बदलने से वास्तविक परिवर्तन आता है। उत्तर प्रदेश को अब ऐसी राजनीति की जरूरत है, जो सामाजिक समीकरणों से आगे बढ़कर वास्तविक भागीदारी और समान अवसर सुनिश्चित करे।















