21, मार्च
दुर्लभ उड़ने वाली गिलहरी, जिसे फ्लाइंग स्क्विरेल कहा जाता है, एक अद्भुत स्तनधारी जीव है जिसकी खोज वैज्ञानिकों द्वारा कई चरणों में की गई। विश्व में उड़ने वाली गिलहरियों का वैज्ञानिक अध्ययन सबसे पहले 18वीं शताब्दी में यूरोप के प्रकृतिविदों ने किया, जबकि भारत में पाई जाने वाली कुछ दुर्लभ प्रजातियों, जैसे नामदाफा क्षेत्र की उड़ने वाली गिलहरी, को 20वीं शताब्दी में पूर्वोत्तर भारत के घने जंगलों में पहचाना गया। यह जीव मुख्य रूप से भारत, चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया और उत्तरी अमेरिका के घने वनों में पाया जाता है, और भारत में यह अरुणाचल प्रदेश, असम और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों में अधिक मिलती है। इसके शरीर की सबसे खास विशेषता इसके आगे और पीछे के पैरों के बीच फैली पतली चमड़ी की परत होती है, जो इसे हवा में फिसलने की क्षमता देती है। यह गिलहरी पक्षियों की तरह उड़ती नहीं, बल्कि एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक नियंत्रित तरीके से ग्लाइड करती है, और एक बार में लगभग 100 से 150 मीटर तक की दूरी तय कर सकती है। यह जीव अधिकतर रात में सक्रिय रहता है, इसलिए इसे देख पाना कठिन होता है, और दिन में यह पेड़ों के खोखलों या घोंसलों में छिपा रहता है। इसकी बड़ी आँखें अंधेरे में देखने के लिए अनुकूल होती हैं, जिससे यह रात में आसानी से भोजन खोज पाती है।

इसके भोजन में फल, बीज, मेवे, फूल, पत्तियाँ और कभी-कभी छोटे कीड़े शामिल होते हैं, जो इसे जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से इसकी ग्लाइड करने की क्षमता वायु के दबाव, शरीर के संतुलन और फैलाव पर आधारित होती है, जहाँ इसकी त्वचा की परत हवा को पकड़कर इसे धीरे-धीरे नीचे की ओर ले जाती है। यह क्षमता इसे शिकारियों से बचाने में भी मदद करती है, क्योंकि यह तेजी से पेड़ों के बीच स्थान बदल सकती है। दुर्भाग्यवश, आज जंगलों की कटाई, पर्यावरण में परिवर्तन और मानव गतिविधियों के कारण इसकी कई प्रजातियाँ संकट में हैं। कुछ प्रजातियाँ इतनी दुर्लभ हैं कि उन्हें वर्षों तक देखा नहीं जाता और फिर अचानक खोज में सामने आती हैं, जिससे यह जीव वैज्ञानिकों के लिए भी रहस्य बना हुआ है। इसलिए इसके संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि यह अनोखा जीव भविष्य में भी पृथ्वी की जैव विविधता का हिस्सा बना रहे और प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहे, इसके अलावा आधुनिक वैज्ञानिक इसके ग्लाइड करने के तरीके का अध्ययन करके नई तकनीकों के विकास में भी उपयोग कर रहे हैं, जिससे यह जीव केवल प्राकृतिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।












