संपादकीय
25 May, 2026

60 दिन की मियाद और टूटते सपने

भारतीय एच-1बी वीजा धारक टेक कर्मचारियों पर अमेरिकी छंटनी और 60 दिन की सख्त समयसीमा के कारण नौकरी, स्थायित्व और भविष्य को लेकर गहरा संकट और अनिश्चितता उत्पन्न हो गई है।

अमेरिका, 25 मई।

एच-1बी वीजा पर अमेरिका में कार्यरत भारतीय टेक कर्मचारियों के सामने इस समय सबसे गंभीर चुनौती केवल नौकरी छिनने की नहीं, बल्कि पूरे जीवन की स्थिरता पर संकट का बनना है। मेटा, गूगल, अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और लिंक्डइन जैसी दिग्गज कंपनियों में बड़े पैमाने पर छंटनी के बाद हजारों भारतीय पेशेवरों पर देश छोड़ने की नौबत आ गई है। जो अमेरिका कभी अवसरों की भूमि माना जाता था, वह अब अनेक भारतीय परिवारों के लिए 60 दिन के भीतर प्रस्थान के दबाव वाला देश बनता जा रहा है।

2026 की शुरुआत से अब तक 144 टेक कंपनियों में एक लाख दस हजार से अधिक कर्मचारियों की छंटनी हो चुकी है। इसका सबसे अधिक प्रभाव एच-1बी वीजा धारक भारतीयों पर पड़ा है, क्योंकि अमेरिकी नियमों के अनुसार नौकरी समाप्त होते ही 60 दिन की समयसीमा शुरू हो जाती है। इस अवधि में नई नौकरी प्राप्त कर वीजा ट्रांसफर करना आवश्यक होता है, अन्यथा देश छोड़ना पड़ता है। वित्त वर्ष 2025 में स्वीकृत कुल चार लाख छह हजार से अधिक एच-1बी आवेदनों में लगभग दो लाख तिरासी हजार भारतीयों के थे, जिससे उनकी हिस्सेदारी लगभग सत्तर प्रतिशत बनती है।

नियमों के अनुसार एच-1बी वीजा का आधार नियोक्ता द्वारा प्रायोजित होता है, और नौकरी समाप्त होते ही वीजा की वैधता भी प्रभावित हो जाती है। इसके बाद केवल 60 दिनों की राहत अवधि मिलती है, जिसकी गणना अंतिम कार्य दिवस से की जाती है। इस दौरान तीन विकल्प रहते हैं—नई कंपनी द्वारा वीजा ट्रांसफर, स्थिति परिवर्तन कर विजिटर या छात्र वीजा लेना, या फिर देश वापसी। समयसीमा पूरी होने पर व्यक्ति अवैध स्थिति में आ जाता है, जिससे भविष्य में वीजा प्राप्त करने की संभावना भी प्रभावित होती है।

तकनीकी क्षेत्र में नई भर्तियों की रफ्तार लगभग थम चुकी है। स्टार्टअप निवेश घटने और बड़ी कंपनियों में लगातार छंटनी के कारण 60 दिनों में नई नौकरी मिलना बेहद कठिन हो गया है। इससे कर्मचारियों पर अनिश्चितता और बढ़ गई है।

अधिकांश भारतीय पेशेवर 30 से 45 वर्ष की आयु के हैं और लंबे समय से अमेरिका में बसे हुए हैं। कई लोगों ने घर, परिवार और बच्चों की शिक्षा तक वहीं स्थापित कर ली है। अनेक बच्चों का जन्म अमेरिका में हुआ है, फिर भी नौकरी समाप्त होते ही पूरा जीवन ढांचा प्रभावित हो जाता है। ग्रीन कार्ड प्रक्रिया भी लंबित स्थिति में फंस जाती है, जिससे वर्षों से प्रतीक्षित स्थायी निवास की राह और लंबी हो जाती है।

पहले कुछ लोग विजिटर वीजा के माध्यम से अतिरिक्त समय प्राप्त कर लेते थे, लेकिन अब इस प्रक्रिया पर भी सख्ती बढ़ गई है। हाल के समय में ऐसे आवेदनों पर अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जा रहे हैं या उन्हें खारिज किया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार कार्य उद्देश्य से आए व्यक्ति का अचानक पर्यटक बनकर रुकना संदेह की श्रेणी में आ सकता है।

कंपनियों के लिए एच-1बी कर्मचारियों की छंटनी अपेक्षाकृत सरल प्रक्रिया है, क्योंकि अमेरिकी नागरिकों के विपरीत विदेशी कर्मचारियों पर अतिरिक्त कानूनी दायित्व नहीं होते। इसी कारण छंटनी में विदेशी कर्मचारियों की संख्या अधिक दिखाई देती है।

अब यह स्थिति भारत के लिए भी चिंता का विषय बन गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को अमेरिका के साथ बातचीत में 60 दिन की अवधि बढ़ाने का मुद्दा उठाना चाहिए। साथ ही लौट रहे अनुभवी पेशेवरों को देश में ही तकनीकी क्षेत्रों में अवसर देकर उनकी क्षमता का उपयोग करना होगा।

यह स्थिति भारतीय युवाओं के लिए भी एक बड़ा संकेत है कि एच-1बी वीजा स्थायी सुरक्षा नहीं है। करियर योजना में वैकल्पिक देशों और भारत में अवसरों को भी समान महत्व देना आवश्यक हो गया है।

आज हजारों भारतीय परिवार 60 दिन की उलटी गिनती में जी रहे हैं। किसी के पास कुछ दिन बचे हैं तो किसी के पास कुछ सप्ताह। यह केवल वीजा संकट नहीं, बल्कि वैश्विक रोजगार व्यवस्था के बदलते स्वरूप का संकेत है, जहां अवसर अब शर्तों के साथ मिलते दिखाई दे रहे हैं।

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