देश में जमानत याचिकाओं की सुनवाई में हो रही देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और अहम निर्देश जारी किया है। शीर्ष अदालत ने सभी हाईकोर्ट को स्पष्ट कहा है कि अब “तारीख पर तारीख” की स्थिति समाप्त होनी चाहिए और जमानत मामलों का निपटारा तय समयसीमा में किया जाना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देश में कहा कि जमानत याचिकाओं की सुनवाई में अनावश्यक देरी सीधे तौर पर व्यक्ति के स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। इसलिए हाईकोर्ट में लंबित मामलों के लिए एक व्यवस्थित और स्वचालित लिस्टिंग सिस्टम विकसित किया जाए।
न्यायालय ने निर्देश दिया कि जमानत याचिकाओं को हर सप्ताह या अधिकतम दो सप्ताह में एक बार अनिवार्य रूप से सूचीबद्ध किया जाए। इसके साथ ही नई याचिकाओं को दाखिल होने के दो दिन से लेकर अधिकतम सात दिन के भीतर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पहली सुनवाई से पहले संबंधित राज्य सरकार या जांच एजेंसी को अनिवार्य रूप से अपनी स्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी होगी, ताकि अदालत को मामले की स्पष्ट जानकारी मिल सके और प्रक्रिया में तेजी आए।
शीर्ष अदालत ने मौजूदा प्रक्रिया पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि नोटिस जारी करने की पुरानी व्यवस्था से मामलों में अनावश्यक देरी होती है, इसलिए कई मामलों में प्रारंभिक स्तर पर नोटिस जारी करने में छूट भी दी जा सकती है।
इसके अलावा कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि किसी जमानत याचिका पर सुनवाई नहीं हो पाती है, तो उसे स्वतः पुनः सूचीबद्ध किया जाए और उसे लंबे समय तक लंबित न रखा जाए। सभी हाईकोर्ट को मामलों के निपटारे के लिए स्पष्ट समयसीमा तय करने को भी कहा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने फोरेंसिक साइंस लैब रिपोर्ट में हो रही देरी पर भी चिंता जताई और जांच एजेंसियों को अधिक जिम्मेदारी के साथ काम करने की सलाह दी। अदालत ने कहा कि जांच में ढिलाई का लाभ आरोपी को जमानत के रूप में मिल सकता है, इसलिए सभी एजेंसियों को समन्वय के साथ काम करना होगा।










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