15 मई।
नीट-यूजी 2026 परीक्षा रद्द होना केवल 22 लाख विद्यार्थियों के लिए झटका नहीं, बल्कि देश की परीक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल है। जिस परीक्षा को लाखों छात्र अपने भविष्य की सबसे बड़ी सीढ़ी मानते हैं, उसमें पेपर लीक जैसी घटनाएं व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करती हैं। दोबारा परीक्षा कराने का निर्णय भले आवश्यक हो, लेकिन इससे छात्रों और अभिभावकों की मानसिक पीड़ा कम नहीं होती। महीनों की तैयारी के बाद फिर उसी दबाव से गुजरना किसी भी विद्यार्थी के लिए आसान नहीं है।
इस मामले ने यह भी दिखाया है कि पेपर लीक अब पारंपरिक तरीकों तक सीमित नहीं रहा। हाई-डेफिनिशन स्कैनर, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप और संगठित नेटवर्क का इस्तेमाल यह संकेत देता है कि परीक्षा माफिया तकनीक के साथ और अधिक खतरनाक हो चुका है। कई राज्यों में जांच, कोचिंग संस्थानों पर सवाल और विभिन्न गिरफ्तारियां यह साबित करती हैं कि समस्या केवल एक केंद्र या राज्य तक सीमित नहीं है।
असल चिंता भारत की परीक्षा प्रणाली की संरचना को लेकर है। आज भी प्रश्नपत्रों की छपाई, परिवहन और वितरण कई स्तरों से होकर गुजरता है। हर स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत की संभावना बनी रहती है। यही कारण है कि बार-बार सुरक्षा व्यवस्था के दावे होने के बावजूद लीक की घटनाएं सामने आती रहती हैं।
अब केवल अस्थायी समाधान पर्याप्त नहीं होंगे। राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी को परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार करने होंगे। डिजिटल एन्क्रिप्टेड ट्रांसफर, बायोमेट्रिक सत्यापन, परीक्षा केंद्रों पर अंतिम समय में सुरक्षित प्रिंटिंग और नियमित सुरक्षा ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं लागू करनी होंगी। साथ ही दोषियों के खिलाफ त्वरित और कठोर कार्रवाई भी जरूरी है।
प्रतियोगी परीक्षाएं विद्यार्थियों के ज्ञान और मेहनत की परीक्षा होनी चाहिए, न कि उनकी सहनशक्ति और व्यवस्था पर भरोसे की। यदि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता कमजोर हुई, तो इसका असर केवल छात्रों के भविष्य पर नहीं, बल्कि देश की प्रतिभा और संस्थाओं की साख पर भी पड़ेगा।